छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से प्रकाशित धर्म , आध्यात्म , वास्तु शास्त्र एवम ज्योतिष पर आधारित मासिक पत्र।
Monday, January 31, 2011
वसन्त पञ्चमी - 08 फ़रवरी 2011 को
वसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की पूजा की जाती है। यह पूजा वैसे तो सम्पूर्ण भारत में माँ सरस्वती के साधक करते हैं लेकिन पूर्वी भारत में बड़े उल्लास से मनायी जाती है। प्राचीन भारत में पूरे साल को जिन छह मौसमों में बाँटा जाता था उनमें वसंत लोगों का सबसे मनचाहा मौसम था।जब फूलों पर बहार आ जाती, खेतों मे सरसों का सोना चमकने लगता, जौ और गेहूँ की बालियाँ खिलने लगतीं, आमों के पेड़ों पर बौर आ जाता और हर तरफ़ रंग-बिरंगी तितलियाँ मँडराने लगतीं। वसंत ऋतु का स्वागत करने के लिए माघ महीने के पाँचवे दिन एक बड़ा जश्न मनाया जाता था जिसमें विष्णु और कामदेव की पूजा होती, यह वसंत पंचमी का त्यौहार कहलाता था। शास्त्रों में बसंत पंचमी को ऋषि पंचमी से उल्लेखित किया गया है, तो पुराणों-शास्त्रों तथा अनेक काव्यग्रंथों में भी अलग-अलग ढंग से इसका चित्रण मिलता है।
बसन्त पंचमी की कथा
सृष्टि के प्रारंभिक काल में भगवान विष्णु जी की आज्ञा से ब्रह्मा जी ने जीवों, खासतौर पर मनुष्य योनि की रचना की। लेकिन अपनी सर्जना से वे संतुष्ट नहीं थे। उन्हें लगता था कि कुछ कमी रह गई है जिसके कारण चारों ओर मौन छाया रहता है। भगवान विष्णु जी से अनुमति लेकर ब्रह्मा जी ने अपने कमण्डल से जल छिड़का, पृथ्वी पर जलकण बिखरते ही उसमें कंपन होने लगा। इसके बाद वृक्षों के बीच से एक अद्भुत शक्ति का प्राकट्य हुआ। यह प्राकट्य एक चतुर्भुजी सुंदर स्त्री का था जिसके एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ वर मुद्रा में था। अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी। ब्रह्मा जी ने देवी से वीणा बजाने का अनुरोध किया। जैसे ही देवी ने वीणा का मधुरनाद किया, संसार के समस्त जीव-जन्तुओं को वाणी प्राप्त हो गई। जलधारा में कोलाहल व्याप्त हो गया। पवन चलने से सरसराहट होने लगी। तब ब्रह्माजी ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती कहा। सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है। ये विद्या और बुद्धि प्रदाता हैं। संगीत की उत्पत्ति करने के कारण ये संगीत की देवी भी हैं। बसन्त पंचमी के दिन को इनके जन्मोत्सव के रूप में भी मनाते हैं। ऋग्वेद में भगवती सरस्वती का वर्णन करते हुए कहा गया है- प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु। अर्थात ये परम चेतना हैं। सरस्वती के रूप में ये हमारी बुद्धि, प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों की संरक्षिका हैं। हममें जो आचार और मेधा है उसका आधार भगवती सरस्वती ही हैं। इनकी समृद्धि और स्वरूप का वैभव अद्भुत है। पुराणों के अनुसार श्रीकृष्ण ने सरस्वती से ख़ुश होकर उन्हें वरदान दिया था कि वसंत पंचमी के दिन तुम्हारी भी आराधना की जाएगी और यूँ भारत के कई हिस्सों में वसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की भी पूजा होने लगी जो कि आज तक जारी है। पतंगबाज़ी का वसंत से कोई सीधा संबंध नहीं है। लेकिन पतंग उड़ाने का रिवाज़ हज़ारों साल पहले चीन में शुरू हुआ और फिर कोरिया और जापान के रास्ते होता हुआ भारत पहुँचा।
पर्व का महत्व
वसंत ऋतु आते ही प्रकृति का कण-कण खिल उठता है। मानव तो क्या पशु-पक्षी तक उल्लास से भर जाते हैं। हर दिन नयी उमंग से सूर्योदय होता है और नयी चेतना प्रदान कर अगले दिन फिर आने का आश्वासन देकर चला जाता है। यों तो माघ का यह पूरा मास ही उत्साह देने वाला है, पर वसंत पंचमी (माघ शुक्ल 5) का पर्व भारतीय जनजीवन को अनेक तरह से प्रभावित करता है। प्राचीनकाल से इसे ज्ञान और कला की देवी मां सरस्वती का जन्मदिवस माना जाता है। जो शिक्षाविद भारत और भारतीयता से प्रेम करते हैं, वे इस दिन मां शारदे की पूजा कर उनसे और अधिक ज्ञानवान होने की प्रार्थना करते हैं। कलाकारों का तो कहना ही क्या? जो महत्व सैनिकों के लिए अपने शस्त्रों और विजयादशमी का है, जो विद्वानों के लिए अपनी पुस्तकों और व्यास पूर्णिमा का है, जो व्यापारियों के लिए अपने तराजू, बाट, बहीखातों और दीपावली का है, वही महत्व कलाकारों के लिए वसंत पंचमी का है। चाहे वे कवि हों या लेखक, गायक हों या वादक, नाटककार हों या नृत्यकार, सब दिन का प्रारम्भ अपने उपकरणों की पूजा और मां सरस्वती की वंदना से करते हैं।
फ़रवरी माह 2011 के व्रत - त्यौहार
फ़रवरी माह के व्रत - त्यौहार
1- मास शिवरात्रि व्रत
2- मौनी अमावस्या
3- स्नान दान अमावस्या
4- चन्द्रदर्शन वल्लभाचार्य जयंती
7- विनायकी चतुर्थी व्रत
8- बसंत पंचमी, सरस्वती पूजा
9- श्री शीतला षष्ठी (बंगाल)
10- रथ सप्तमी, अचला सप्तमी व्रत (पुत्र सप्तमी)
11- भीष्माष्टमी
12- महानन्दा नवमी, हरसू ब्रह्मदेव जयंती (भभुआ)
13- कुम्भ संक्रान्ति
14- जया (अजा) एकादशी व्रत, भैमी एकादशी (बंगाल)
15- भीष्म द्वादशी, तिल द्वादशी
16- प्रदोष व्रत
17- व्रत पूर्णिमा
18. माघी पूर्णिमा, संत रविदास जयंती, ललिता जयंती, माघ स्नान प्रारम्भ
19. शिवाजी जयंती
21. गणेश चतुर्थी
25. सीताष्टमी,कालाष्टमी
26. समर्थ गुरु रामदास जयंती
27. स्वामी दयानंद सरस्वती जयंती
28. विजया एकादशी व्रत
Saturday, January 29, 2011
या ते अग्ने पर्वतस्येव धरासश्चन्ती पीपयद्देव चित्रा |
तामस्मभ्यं प्रमतिं जातवेदो वसो रास्व सुमतिं विश्वजन्याम् ||
ऋग्वेद 3|57|6
अर्थ -
या.............................जो
ते.............................तेरी
अग्ने.........................सबको ज्ञानप्रकाश से प्रकाशित करनेवाले ! सबको आगे ले जानेवाले
देव...........................प्रकाशस्वरूप प्रभो !
पर्वतस्य+इव.................पर्वत की धारा के समान
असश्चन्ति...................संसक्त न होती हुई
चित्रा..........................विचित्र , अद्भुत
धारा..........................वेदमयी ज्ञानधारा
पीपयद्......................निरन्तर ज्ञान दान कर रही है, हे
वसो..........................सबको वसानेवाले,
जातवेदः.......................सबमें रहनेवाले, प्रत्येक पदार्थ के ज्ञाता ! सर्वज्ञ भगवन् !
असमभ्यम्...................हमें
ताम्..........................वह
प्रमतिम्......................उत्तम बोध देनेवाली
विश्वजन्याम्................सर्वजनहितकारिणी
सुमतिम्......................वेदरूप कल्याण-मति
रास्व.........................दो, दान करो |
Thursday, January 27, 2011
अपील : श्री सांई अंक के लिए
" भाग्योत्कर्ष " धर्म , आध्यात्म , वास्तु शास्त्र और ज्योतिष से जुड़ा नाम है जो प्रकाशन के क्षेत्र में कार्यरत है । रायपुर (छत्तीसगढ़) से भाग्योत्कर्ष का मासिक प्रकाशन होता है । हर आध्यात्मिक विषय पर भाग्योत्कर्ष का एक विशेष अंक 'वेद-पुराणों' पर आधारित होता है जो ग्लेज आर्ट पेपर प्रकाशित होता है । धार्मिक संस्थानों - आध्यात्मिक चाहत रखने वाले लोगों के हाँथों इसका वितरण धर्मावलंबियों - जिज्ञासु जनों के मध्य होता है ।
अब तक भाग्योत्कर्ष के "अघोर" , "देवी शक्ति" , "समृद्धि" , "मंत्र शक्ति" , "रामसेतु" , "भगवान श्री परशुराम" , "राजिम कुंभ" , "जागरण" , "चेतना" जैसे अनेक महत्वपूर्ण अंक प्रकाशित हुए हैं ।
सर्व विदित है कि यह विषय आज के तड़क-भड़क की दुनियाँ , ग्लेमर की दुनियाँ से अलग है लिहाजा इसका प्रकाशन कठिन ही नहीं दुष्कर होता है । प्रदेश के मुख्य मंत्री डॉ रमन सिंह इस बात को समझते थे , लेकिन यह बात उनके मातहतों को अच्छी नहीं लगी । प्रकाशन लम्बे समय से अवरुद्ध हो गया ।
भाग्योत्कर्ष ने पुनः हिम्मत जुटा कर शिरडी वाले सांई बाबा पर एक विशेष अंक के प्रकाशन की तैयारी की है । बाबा के सक्षम भक्तों से सहयोग की अपेक्षा सहित यहाँ यह पोस्ट लगाई गई है । सहयोग केवल इतना कि इस अंक की प्रतियाँ अपनों - भक्तों के बीच वितरित करने के लिए अग्रिम क्रय कर प्रकाशन को सुलभ सुगम बनाने में मदद करें । - आशुतोष मिश्र / +91 94242 02729
Monday, January 24, 2011
Sunday, January 23, 2011
Thursday, January 20, 2011
Wednesday, January 19, 2011
शुभारंभ और आध्यात्म
नारियल फोडना और दीपप्रज्वलन, ये विधियां वास्तुशुद्धिकी यानी उद्घाटनकी महत्त्वपूर्ण विधियां हैं । 'उद्' का अर्थ है प्रकट करना । देवता तरंगों को प्रकट करना अथवा कार्यस्थल पर उन्हें स्थान ग्रहण करने हेतु आह्वान कर - प्रार्थना कर कार्य आरंभ करना यही है उद्घाटन करना । हिंदू धर्म में प्रत्येक कृति आध्यात्म शास्त्र आधारित है । किसी भी समारोह अथवा कार्य को पूर्ण करने के लिए देवताओं का आशीर्वाद उनकी अनुकम्पा आवश्यक मानी गई है । शास्त्रीय पद्धति अनुसार कार्य का शुभारंभ करने से दैविक तरंगों का कार्यस्थल पर आगमन होता है - सुरक्षा कवच का निर्माण होता है । इससे वहां अनिष्ट की आशंका नहीं रहती है । इसलिए उद्घाटन विधिवत्, अर्थात् अध्यात्म शास्त्र पर आधारित विधि अनुसार ही करना ही श्रेयस्कर माना जाता है । किसी भी व्यासपीठ के कार्यक्रमों का उद्घाटन: परिसंवाद, साहित्य सम्मेलन, संगीत महोत्सव इत्यादि का उद्घाटन दीप प्रज्वलनसे किया जाता है । व्यासपीठ की स्थापना से पूर्व नारियल फोडें और उद्घाटन के समय दीप प्रज्वलित करें । नारियल फोडने के पीछे प्रमुख उद्देश्य है, कार्यस्थल की शुद्धि । व्यासपीठ ज्ञानदानके कार्य से संबंधित है, अर्थात् वह ज्ञानपीठ है । इसलिए वहां दीपक का विशेष महत्त्व है ।
व्यवसायिक प्रतिष्ठान इत्यादि का उद्घाटन दुकान, प्रतिष्ठान इत्यादि अधिकांशत: व्यावहारिक कर्मसे संबंधित होते हैं । इसलिए उनके उद्घाटन अंतर्गत दीप प्रज्वलन की आवश्यकता नहीं होती । इसलिए केवल नारियल फोडें । उद्घाटन के शुभ अवसर पर यदि कोई संत या माहत्मा की उपस्थिती हो तो यह अतिउत्तम स्थिति मानी जाती है क्योंकि संतों के अस्तित्व मात्र से ब्रह्मांड से आवश्यक देवता की सूक्ष्मतर तरंगें कार्यस्थल की ओर आकृष्ट व कार्यरत होती हैं । इससे वातावरण चैतन्यमय व शुद्ध बनता है और कार्यस्थल के चारों ओर सुरक्षा कवच की निर्मिति होती है व जीवों की सूक्ष्मदेह की शुद्धि में सहायता मिलती है ।
व्यवसायिक प्रतिष्ठान इत्यादि का उद्घाटन दुकान, प्रतिष्ठान इत्यादि अधिकांशत: व्यावहारिक कर्मसे संबंधित होते हैं । इसलिए उनके उद्घाटन अंतर्गत दीप प्रज्वलन की आवश्यकता नहीं होती । इसलिए केवल नारियल फोडें । उद्घाटन के शुभ अवसर पर यदि कोई संत या माहत्मा की उपस्थिती हो तो यह अतिउत्तम स्थिति मानी जाती है क्योंकि संतों के अस्तित्व मात्र से ब्रह्मांड से आवश्यक देवता की सूक्ष्मतर तरंगें कार्यस्थल की ओर आकृष्ट व कार्यरत होती हैं । इससे वातावरण चैतन्यमय व शुद्ध बनता है और कार्यस्थल के चारों ओर सुरक्षा कवच की निर्मिति होती है व जीवों की सूक्ष्मदेह की शुद्धि में सहायता मिलती है ।
अलग- अलग वारों के अनुसार प्रदोष व्रत लाभ
सोमवार के दिन त्रयोदशी प्रदोष पड़ने पर किया जाने वाला व्रत आरोग्य प्रदान करता है । सोमवार के दिन जब त्रयोदशी आने पर जब प्रदोष व्रत किया जाने पर, उपवास से संबन्धित मनोकामना पूर्ण होती है । जिस मास में मंगलवार के दिन का प्रदोष हो, उस दिन के व्रत को करने से रोगों से मुक्ति व स्वास्थय लाभ प्राप्त होता है । बुधवार के दिन प्रदोष हो तो, उपवास करने वाले की सभी कामना की पूर्ति होती है । गुरुवार को पड़ने वाला प्रदोष शत्रुओं का विनाश करता है । शुक्रवार के दिन होने वाल प्रदोष व्रत सौभाग्य और दाम्पत्य जीवन की सुख-शान्ति के लिये किया जाता है । संतान प्राप्ति की कामना हो, उन्हें शनिवार के दिन पडने वाला प्रदोष व्रत करना चाहिए । अपने उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए जब प्रदोष व्रत किये जाते है, तो व्रत से मिलने वाले फलों में वृ्द्धि होती है ।
2011 में आने वाले प्रदोष व्रत
2011 में आने वाले प्रदोष व्रत
- चन्द्र मास
- पौष कृ्ष्ण
- पौष शुक्ल (सोमवार)
- माघ कृ्ष्ण (सोमवार)
- माघ शुक्ल
- फाल्गुन कृ्ष्ण
- फाल्गुण शुक्ल
- चैत्र कृ्ष्ण
- चैत्र शुक्ल
- वैशाख कृ्ष्ण
- वैशाख शुक्ल
- ज्येष्ठ कृ्ष्ण (सोमवार)
- ज्येष्ठ शुक्ल
- आषाढ कृ्ष्ण (भौम)
- आषाढ शुक्ल (भौम)
- श्रावण कृ्ष्ण
- श्रावण शुक्ल
- भाद्रपद कृ्ष्ण
- भाद्रपद शुक्ल
- आश्चिन कृ्ष्ण
- आश्चिन शुक्ल
- कार्तिक कृ्ष्ण
- कार्तिक शुक्ल
- मार्गशीर्ष कृ्ष्ण
- मार्गशीर्ष शुक्ल
- पौष कृ्ष्ण
तिथि
- 1 जनवरी
- 17 जनवरी
- 31 जनवरी
- 16 फरवरी
- 02 मार्च
- 17 मार्च
- 31 मार्च
- 15 अप्रैल
- 30 अप्रैल
- 15 मई
- 30 मई
- 13 जून
- 28 जून
- 12 जुलाई
- 28 जुलाई
- 11 अगस्त
- 26 अगस्त
- 09 सितम्बर
- 25 सितम्बर
- 09 अक्तूबर
- 24 अक्तूबर
- 8 नवम्बर
- 23 नवम्बर
- 07 दिसम्बर
- 22 दिसम्बर
वार
- शनिवार
- सोमवार
- सोमवार
- बुधवार
- बुधवार
- गुरुवार
- गुरुवार
- शुक्रवार
- शनिवार
- रविवार
- सोमवार
- सोमवार
- मंगलवार
- मंगलवार
- गुरुवार
- गुरुवार
- शुक्रवार
- शुक्रवार
- रविवार
- रविवार
- सोमवार
- मंगलवार
- बुधवार
- बुधवार
- गुरुवार
Sunday, January 16, 2011
सांसारिक दुखों की भी निवृत्ति होती है प्रदोष व्रत रखने से
प्रदोष व्रत उन लोगों के लिए भी मनोकामनापूरक व्रत है, जिन्हें चन्द्रमा ग्रह से काफी पीड़ित होना पड़ रहा है। साथ ही चन्द्रमा ग्रह के अनेक उपायों में साल भर में प्रदोष व्रतों को उपवास रखना, लोहा, तिल, काली उड़द, शकरकंद, मूली, अरबी, कंबल, जूता और कोयला आदि दान करना हितकर होता है। चाहे गुरूवार हो या कोई अन्य वार, अगर प्रदोष व्रत हो, तो इसके लिए श्रद्धा पूर्वक व्रत रखकर उपरोक्त दान करेंगे तो आपके लिए शनि का प्रकोप काफी हद तक कम हो जाएगा और रोग-व्याधि, दरिद्रता, घर की अशांति, नौकरी या व्यापार में परेशानी आदि का निवारण हो जाएगा।
शनि या मंगल प्रदोष व्रत के दिन शिव मंदिर, हनुमान मंदिर, भैरव मंदिर अथवा शिव मंदिर में पूजा करना भी लाभप्रद होता है। प्रदोष व्रत का दूसरा महत्व पुत्रकामना हेतु अथवा संतान के शुभ हेतु रखने में बृहस्पतिवार का दिन विशेष महत्वपूर्ण होता है। इस दिन मीठे पकवान और फल आदि गाय के बछड़े को देने से संतानहीन दंपत्तियों के लिए भी मनोकामना पूरक होता है। लेकिन, इसके लिए लगातार 16 प्रदोष व्रत करने जरूरी होते हैं। किसी भी प्रकार की संतान बाधा में शनि प्रदोष व्रत भी सबसे उत्तम मनोकामना पूरक उपाय है।
व्रत के दिन पति-पत्नी द्वारा प्रातः स्नान के उपरांत शिव, पार्वती और गणेशजी की संयुक्त आराधना के बाद शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग मे जल चढ़ाना, पीपल पर भी जल चढ़ाकर सारे दिन निर्जल रहना होगा। सायंकाल के समय लोहे की कढ़ाही में उड़द की दाल और मोटे चावल तथा तिल आदि मिलाकर खिचड़ी खानी होगी। खिचड़ी का एक चैथाई भाग काले कुत्ते या गाय को भी देना हितकर होगा।
प्रदोष व्रत रखने से सांसारिक दुखों की भी निवृत्ति होती है। यह आवश्यक नहीं है कि हम महज चंद्रमा की दशा या संतानहीनता के दुख को टालने के लिए इस व्रत को रखें। बल्कि यह व्रत सुख संपदा युक्त जीवन शैली के अलावा हमें यश, कीर्ति, ख्याति और वैभव देने में समर्थ होता है। विशेष रूप से श्रावण भाद्रपद, कार्तिक और माघ मास में पड़ने वाले प्रदोष व्रत आज के दैहिक और भौतिक कष्टों को निवारण करने में परम सहायक होते हैं।
शनि या मंगल प्रदोष व्रत के दिन शिव मंदिर, हनुमान मंदिर, भैरव मंदिर अथवा शिव मंदिर में पूजा करना भी लाभप्रद होता है। प्रदोष व्रत का दूसरा महत्व पुत्रकामना हेतु अथवा संतान के शुभ हेतु रखने में बृहस्पतिवार का दिन विशेष महत्वपूर्ण होता है। इस दिन मीठे पकवान और फल आदि गाय के बछड़े को देने से संतानहीन दंपत्तियों के लिए भी मनोकामना पूरक होता है। लेकिन, इसके लिए लगातार 16 प्रदोष व्रत करने जरूरी होते हैं। किसी भी प्रकार की संतान बाधा में शनि प्रदोष व्रत भी सबसे उत्तम मनोकामना पूरक उपाय है।
व्रत के दिन पति-पत्नी द्वारा प्रातः स्नान के उपरांत शिव, पार्वती और गणेशजी की संयुक्त आराधना के बाद शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग मे जल चढ़ाना, पीपल पर भी जल चढ़ाकर सारे दिन निर्जल रहना होगा। सायंकाल के समय लोहे की कढ़ाही में उड़द की दाल और मोटे चावल तथा तिल आदि मिलाकर खिचड़ी खानी होगी। खिचड़ी का एक चैथाई भाग काले कुत्ते या गाय को भी देना हितकर होगा।
प्रदोष व्रत रखने से सांसारिक दुखों की भी निवृत्ति होती है। यह आवश्यक नहीं है कि हम महज चंद्रमा की दशा या संतानहीनता के दुख को टालने के लिए इस व्रत को रखें। बल्कि यह व्रत सुख संपदा युक्त जीवन शैली के अलावा हमें यश, कीर्ति, ख्याति और वैभव देने में समर्थ होता है। विशेष रूप से श्रावण भाद्रपद, कार्तिक और माघ मास में पड़ने वाले प्रदोष व्रत आज के दैहिक और भौतिक कष्टों को निवारण करने में परम सहायक होते हैं।
Saturday, January 15, 2011
माघ मास का "सकट चौथ"
माघ मास का "सकट चौथ"
प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष चतुर्थी यूं तो गणेश चतुर्थी कहलाती है तथा धार्मिक प्रवृत्ति की स्त्रियां उस दिन व्रत एवम श्रीगणेश पूजन करती हैं। परंतु जहां तक माघमास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी का प्रश्न है, सभी महिलाएं इस व्रत को करती हैं। लोक प्रचलित भाषा में इसे सकट चौथ कहा जाता है। वैसे वक्रतुण्डी चतुर्थी , माघी चौथ अथवा तिलकुट चौथ इसी के अन्य नाम हैं। इस दिन संकट हरण श्रीगणेश जी तथा चंद्रमा का पूजन किया जाता है। यह व्रत संकटों तथा दुखों को दूर करने वाला तथा सभी इच्छाएं व मनोकामनाएं पूरी करने वाला माना जाता है।
इस दिन स्त्रियां निर्जला व्रत करती हैं। एक पटरे पर मिट्टी की डली को गणेशजी के रूप में रखकर उनकी पूजा की जाती है और कथा सुनने के बाद लोटे में भरा जल चंद्रमा को अर्ध्य देकर ही व्रत खोला जाता है। रात्रि को चंद्रमा को अर्ध्य देने के बाद ही महिलाएं भोजन करती है। सकट चौथ के दिन तिल को भूनकर गुड़ के साथ कूटकर तिलकुटा अर्थात तिलकुट का पहाड़ बनाया जाता है। कहीं-कहीं तिलकुट का बकरा भी बनाया जाता है। उसकी पूजा करके घर का कोई बच्चा उसकी गर्दन काटता है, फिर सबको प्रसाद दिया जाता है।
तिलकुटे से ही गणेशजी का पूजन किया जाता है तथा इसका ही बायना निकालते हैं और तिलकुट को भोजन के साथ खाते भी हैं। जिस घर में लड़के की शादी या लड़का हुआ हो, उस वर्ष सकट चौथ को सवा किलो तिलों को सवा किलो शक्कर या गुड़ के साथ कूटकर इसके तेरह लड्डू बनाए जाते हैं। इन लड्डूओं को बहू बायने के रूप में सास को देती है। कहीं-कहीं इस दिन व्रत रहने के बाद सायंकाल चंद्रमा को दूध का अर्ध्य देकर पूजा की जाती है। गौरी-गणेश की स्थापना कर उनका पूजन तथा वर्षभर उन्हें घर में रखा जाता है। तिल, ईख, गंजी, भांटा, अमरूद, गुड़, घी से चंद्रमा गणेश का भोग लगाया जाता है। यह नैवेद्य रात भर डलिया से ढककर रख दिया जाता है, जिसे 'पहार' कहते हैं। पुत्रवती माताएं पुत्र तथा पति की सुख-समृद्धि के लिए यह व्रत करती हैं। उस ढके हुए 'पहार' को पुत्र ही खोलता है तथा उसे भाई-बंधुओं में बांटा जाता है।
प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष चतुर्थी यूं तो गणेश चतुर्थी कहलाती है तथा धार्मिक प्रवृत्ति की स्त्रियां उस दिन व्रत एवम श्रीगणेश पूजन करती हैं। परंतु जहां तक माघमास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी का प्रश्न है, सभी महिलाएं इस व्रत को करती हैं। लोक प्रचलित भाषा में इसे सकट चौथ कहा जाता है। वैसे वक्रतुण्डी चतुर्थी , माघी चौथ अथवा तिलकुट चौथ इसी के अन्य नाम हैं। इस दिन संकट हरण श्रीगणेश जी तथा चंद्रमा का पूजन किया जाता है। यह व्रत संकटों तथा दुखों को दूर करने वाला तथा सभी इच्छाएं व मनोकामनाएं पूरी करने वाला माना जाता है।
इस दिन स्त्रियां निर्जला व्रत करती हैं। एक पटरे पर मिट्टी की डली को गणेशजी के रूप में रखकर उनकी पूजा की जाती है और कथा सुनने के बाद लोटे में भरा जल चंद्रमा को अर्ध्य देकर ही व्रत खोला जाता है। रात्रि को चंद्रमा को अर्ध्य देने के बाद ही महिलाएं भोजन करती है। सकट चौथ के दिन तिल को भूनकर गुड़ के साथ कूटकर तिलकुटा अर्थात तिलकुट का पहाड़ बनाया जाता है। कहीं-कहीं तिलकुट का बकरा भी बनाया जाता है। उसकी पूजा करके घर का कोई बच्चा उसकी गर्दन काटता है, फिर सबको प्रसाद दिया जाता है।
तिलकुटे से ही गणेशजी का पूजन किया जाता है तथा इसका ही बायना निकालते हैं और तिलकुट को भोजन के साथ खाते भी हैं। जिस घर में लड़के की शादी या लड़का हुआ हो, उस वर्ष सकट चौथ को सवा किलो तिलों को सवा किलो शक्कर या गुड़ के साथ कूटकर इसके तेरह लड्डू बनाए जाते हैं। इन लड्डूओं को बहू बायने के रूप में सास को देती है। कहीं-कहीं इस दिन व्रत रहने के बाद सायंकाल चंद्रमा को दूध का अर्ध्य देकर पूजा की जाती है। गौरी-गणेश की स्थापना कर उनका पूजन तथा वर्षभर उन्हें घर में रखा जाता है। तिल, ईख, गंजी, भांटा, अमरूद, गुड़, घी से चंद्रमा गणेश का भोग लगाया जाता है। यह नैवेद्य रात भर डलिया से ढककर रख दिया जाता है, जिसे 'पहार' कहते हैं। पुत्रवती माताएं पुत्र तथा पति की सुख-समृद्धि के लिए यह व्रत करती हैं। उस ढके हुए 'पहार' को पुत्र ही खोलता है तथा उसे भाई-बंधुओं में बांटा जाता है।
उत्तर भारतीय लोग लकड़ी के एक पाटे पर श्री गणेश , संकठा माँ , माँ अन्न्पूर्णा , लक्ष्मी जी सहित अन्य देवी-देवताओं का चन्दन से चित्र बना कर पूजन करते हैं , सुहाग की सामग्री , गुड़ से बने विभिन्न प्रकार के लड्डुओं का भोग अर्पित करते हैं । तिल का प्रतीकात्मक बकरा बना कर पुजन करते हैं । यहाँ यह पूजा गोघुली बेला में की जाती है।
Friday, January 14, 2011
Thursday, January 13, 2011
आईए जाने मकर संक्रांति के बाद बारह राशियों पर पड़ने वाला प्रभाव
इस वर्ष 2011 को 14 जनवरी की मध्य रात्रि सूर्य देव अपनी राशि बदलकर धनु राशि से मकर में प्रवेश करेंगे । सूर्य प्रत्येक ग्रह राशियों पर परिभ्रमण करते हैं और राशियों पर अपना शुभ-अशुभ प्रभाव डालते हैं। सूर्य जब मकर राशि पर परिभ्रमण करेंगे तो बारह राशियों पर क्या प्रभाव पड़ेगा आईये जानते हैं , यहाँ राशियों पर होने वाले प्रभाव एवम उनके लिए उपाय दिए गये हैं -
मेष- आर्थिक परेशानी के साथ स्वास्थ्य संबंधी तकलीफ देता है। मित्र या रिश्तेदारी में लड़ाई करा सकता है। आकस्मिक घटनाएँ होने की संभावना बनाता है।
उपाय- ॐ घृणि सूर्याय नम: बोलकर अर्घ्य दें।
वृषभ- मानसिक परेशानी के साथ धन हानि देता है। शत्रुओं से कष्ट दिला सकता है। शत्रु संख्या भी बढ़ा सकता है। फिजूलखर्च एवं मान-सम्मान में कभी कराता है।
उपाय- आदित्य स्त्रोतम् का पाठ करें। माणिक धारण करें।
मिथुन- इच्छाओं की पूर्ति कराएगा। नौकरी वालों को पदोन्नति दिलाएगा। सुख, शांति एवं समृद्धि प्रदान करेगा। पुरस्कार प्राप्त होगा।
उपाय- ताँबे की वस्तु का दान करें।
कर्क- बिछड़े एवं टूटे हुए साथियों को मिलवाएगा। नए संबंध बनाएगा, घर में मांगलिक कार्य होंगे। सुख-शांति प्रदान होगी।
सुझाव- गंगाजल से स्नान करें। तीर्थ यात्रा करें।
सिंह- मानसिक रोग में सुधार होगा। मकर का सूर्य वाहन-दुर्घटना अथवा सामान्य दुर्घटना करा सकता है। आर्थिक तंगी आएगी।
उपाय- माणिक, कमल फूल, गुड, लाल चंदन, लाल वस्त्र, ताँबा, केसर, स्वर्ण रविवार को दान करें।
कन्या- स्वभाव में उग्रता लाएगा। धन हानि के साथ-साथ मान-सम्मान में कमी ला सकता है। परिवार से दूरी के योग बना सकता है।
उपाय- माणिक के साथ सोना दान करें।
तुला- सामाजिक अथवा धार्मिक यात्रा का योग कराएगा। परंतु आर्थिक कष्ट के साथ परिवार से दूरी करा सकता है।
सुझाव- आदित्य स्त्रोतम् का पाठ करें।
वृश्चिक- उन्नति अर्थात् सु-व्यवस्थित पद दिलाएगा। परिवार में सुख-शांति एवं सम्मान में वृद्धि कराएगा। स्वास्थ्य सुधार होगा।
सुझाव- सूर्य का जप करें (ॐ सूर्याय नम:)।
धनु- वैवाहिक सुख में कमी करा सकता है। घर में अशांति के साथ बीमारी के कारण आर्थिक कष्ट कराएगा।
उपाय- लाल चंदन, ताँबा, गुड रविवार को दान करें।
मकर- अधिकारियों से परेशानी हो सकती है। दुर्घटना के योग बनते है। मानसिक परेशानी के साथ बीमारी का भय रहेगा।
उपाय- लाल फूल एवं कुँकू डालकर सूर्य को अर्घ्य दें।
कुंभ- शत्रुओं पर विजय प्राप्त कराएगा। मानसिक आर्थिक सुख शांति प्रदान करेगा। घर में खुशियाँ आएँगी।
सुझाव- स्नान में तीर्थ का जल मिलाएँ।
मीन- उदर अथवा मूत्राशय संबंधी तकलीफ दे सकता है। परिवार से तालमेल में कमी करा सकता है।
उपाय- लाल चंदन का दान करें। साथ ही आदित्य स्त्रोतम् का पाठ करें।
Monday, January 10, 2011
मकर संक्रांति अबकी बार 15 को
पौष शुक्ल दशमी शुक्रवार तदनुसार 14 जनवरी 2011 को रात्रि में 12 बजकर 31 मिनट पर सूर्य मकर राशि में प्रवेश कर रहा है। धर्मशास्त्रों के अनुसार मकर संक्रांति का पुण्य काल संक्रांति के पश्चात 16 घण्टा तक रहेगा । इस प्रकार मकर संक्रांति जन्म पुण्यकाल दूसरे दिन होना चाहिए। मकर संक्रांति जन्म पुण्यकाल पौष शुक्ला एकादशी शनिवार तद्नुसार 15 जनवरी को सायं 4 बजकर 31 मिनट तक रहेगा यानि उसी दिन मकर संक्रांति मनाई जायेगी। विशेष पुण्यकाल 15 की सुबह 08:15 तक रहेगा । दोपहर 12 बजे तक सामान्य पुण्यकाल रहेगा । इस पर्व पर छः प्रकार से तिल का प्रयोग करना लाभप्रद बताया गया है । तिल का उबटन , तिल मिले जल से स्नान , तिल से हवन , तिल का खाना , तिल मिला जल पीना और तिल का दान इस दिन अच्छा माना गया है । शुभम करोति ।
Sunday, January 9, 2011
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