छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से प्रकाशित धर्म , आध्यात्म , वास्तु शास्त्र एवम ज्योतिष पर आधारित मासिक पत्र।
Tuesday, September 21, 2010
श्रद्धा से ही है "श्राद्ध"
मनुष्य तीन ऋणों को लेकर जन्म लेता है - देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण। देवार्चन से देव ऋण, अध्ययन से ऋषि ऋण एवं पुत्र की उत्पत्ति के बाद एवम श्राद्ध कर्म से पितृ ऋण से मुक्ति मिलती है। श्रद्धा से ही श्राद्ध है । श्रद्धापूर्वक पितरों के लिए ब्राह्मण भोजन, तिल, जल आदि से तर्पण एवं दान करने से पितृ ऋण से मुक्ति और पितरों को प्रसन्नता मिलती है और हमें उनका आशीर्वाद मिलता है , जिससे हम सपरिवार सुख-समृद्धि प्राप्त करते हैं । अपने पितरों को प्रसन्न कर हम ॠण मुक्त तो होते ही हैं साथ ही इह लोक और परलोक भी सुधार सकते हैं ।
पितृपक्ष और श्राद्ध
आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक ऊपर की रश्मि तथा रश्मि के साथ पितृप्राण पृथ्वी पर व्याप्त रहता है। श्राद्ध की भूलभूत परिभाषा यह है कि प्रेत और पितर के निमित्त, उनकी आत्मा की तृप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक जो अर्पित किया जाए वह श्राद्ध है। मृत्यु के बाद दशगात्र और षोडशी-सपिण्डन तक मृत व्यक्ति की प्रेत संज्ञा रहती है। सपिण्डन के बाद वह पित्तरों में सम्मिलित हो जाता है।
पितृपक्ष भर में जो तर्पण किया जाता है उससे वह पितृप्राण स्वयं आप्यापित होता है। पुत्र या उसके नाम से उसका परिवार जो यव तथा चावल का पिण्ड देता है, उसमें से रेतस् का अंश लेकर वह चंद्रलोक में अम्भप्राण का ऋण चुका देता है। ठीक आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से वह चक्र ऊपर की ओर होने लगता है। 15 दिन अपना-अपना भाग लेकर शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से उसी रश्मि के साथ रवाना हो जाता है। इसलिए इसको पितृपक्ष कहते हैं और इसी पक्ष में श्राद्ध करने से पित्तरों को प्राप्त होता है।
शास्त्रों का निर्देश है कि माता-पिता आदि के निमित्त उनके नाम और गोत्र का उच्चारण कर मंत्रों द्वारा जो अन्न आदि अर्पित किया जाता है, वह उनको प्राप्त हो जाता है। यदि अपने कर्मों के अनुसार उनको देव योनि प्राप्त होती है तो वह अमृत रूप में उनको प्राप्त होता है।
उन्हें गन्धर्व लोक प्राप्त होने पर भोग्य रूप में, पशु योनि में तृण रूप में, सर्प योनि में वायु रूप में, यक्ष रूप में पेय रूप में, दानव योनि में मांस के रूप में, प्रेत योनि में रुधिर के रूप में और मनुष्य योनि में अन्न आदि के रूप में उपलब्ध होता है।
जब पित्तर यह सुनते हैं कि श्राद्धकाल उपस्थित हो गया है तो वे एक-दूसरे का स्मरण करते हुए मनोनय रूप से श्राद्धस्थल पर उपस्थित हो जाते हैं और ब्राह्मणों के साथ वायु रूप में भोजन करते हैं। यह भी कहा गया है कि जब सूर्य कन्या राशि में आते हैं तब पित्तर अपने पुत्र-पौत्रों के यहाँ आते हैं।
विशेषतः आश्विन-अमावस्या के दिन वे दरवाजे पर आकर बैठ जाते हैं। यदि उस दिन उनका श्राद्ध नहीं किया जाता तब वे श्राप देकर लौट जाते हैं। अतः उस दिन पत्र-पुष्प-फल और जल-तर्पण से यथाशक्ति उनको तृप्त करना चाहिए। श्राद्ध से विमुख नहीं होना चाहिए ।
पितृपक्ष भर में जो तर्पण किया जाता है उससे वह पितृप्राण स्वयं आप्यापित होता है। पुत्र या उसके नाम से उसका परिवार जो यव तथा चावल का पिण्ड देता है, उसमें से रेतस् का अंश लेकर वह चंद्रलोक में अम्भप्राण का ऋण चुका देता है। ठीक आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से वह चक्र ऊपर की ओर होने लगता है। 15 दिन अपना-अपना भाग लेकर शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से उसी रश्मि के साथ रवाना हो जाता है। इसलिए इसको पितृपक्ष कहते हैं और इसी पक्ष में श्राद्ध करने से पित्तरों को प्राप्त होता है।
शास्त्रों का निर्देश है कि माता-पिता आदि के निमित्त उनके नाम और गोत्र का उच्चारण कर मंत्रों द्वारा जो अन्न आदि अर्पित किया जाता है, वह उनको प्राप्त हो जाता है। यदि अपने कर्मों के अनुसार उनको देव योनि प्राप्त होती है तो वह अमृत रूप में उनको प्राप्त होता है।
उन्हें गन्धर्व लोक प्राप्त होने पर भोग्य रूप में, पशु योनि में तृण रूप में, सर्प योनि में वायु रूप में, यक्ष रूप में पेय रूप में, दानव योनि में मांस के रूप में, प्रेत योनि में रुधिर के रूप में और मनुष्य योनि में अन्न आदि के रूप में उपलब्ध होता है।
जब पित्तर यह सुनते हैं कि श्राद्धकाल उपस्थित हो गया है तो वे एक-दूसरे का स्मरण करते हुए मनोनय रूप से श्राद्धस्थल पर उपस्थित हो जाते हैं और ब्राह्मणों के साथ वायु रूप में भोजन करते हैं। यह भी कहा गया है कि जब सूर्य कन्या राशि में आते हैं तब पित्तर अपने पुत्र-पौत्रों के यहाँ आते हैं।
विशेषतः आश्विन-अमावस्या के दिन वे दरवाजे पर आकर बैठ जाते हैं। यदि उस दिन उनका श्राद्ध नहीं किया जाता तब वे श्राप देकर लौट जाते हैं। अतः उस दिन पत्र-पुष्प-फल और जल-तर्पण से यथाशक्ति उनको तृप्त करना चाहिए। श्राद्ध से विमुख नहीं होना चाहिए ।
प्रथम शैलपुत्री
इनके ध्यान का मंत्र है:-
”वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्द्वकृत शेखराम।
वृषारूढ़ा शूलधरां शैलपुत्री यशस्विनीम॥“
गिरिराज हिमालय की पुत्री होने के कारण भगवती का प्रथम स्वरूप शैलपुत्री का है, जिनकी आराधना से प्राणी सभी मनोवांछित फल प्राप्त कर लेता है।
द्वितीय ब्रह्मचारिणी
इनके ध्यान का मंत्र है:-
“दधना कर पद्याभ्यांक्षमाला कमण्डलम।
देवी प्रसीदमयी ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥“
जो दोनो कर-कमलो मे अक्षमाला एवं कमंडल धारण करती है। वे सर्वश्रेष्ठ माँ भगवती ब्रह्मचारिणी मुझसे पर अति प्रसन्न हों। माँ ब्रह्मचारिणी सदैव अपने भक्तो पर कृपादृष्टि रखती है एवं सम्पूर्ण कष्ट दूर करके अभीष्ट कामनाओ की पूर्ति करती है।
तृतीय चन्द्रघण्टा
इनके ध्यान का मंत्र है:-
”पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैयुता।
प्रसादं तनुते मद्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥“
इनकी आराधना से मनुष्य के हृदय से अहंकार का नाश होता है तथा वह असीम शांति की प्राप्ति कर प्रसन्न होता है। माँ चन्द्रघण्टा मंगलदायनी है तथा भक्तों को निरोग रखकर उन्हें वैभव तथा ऐश्वर्य प्रदान करती है। उनके घंटो मे अपूर्व शीतलता का वास है।
चर्तुथकम कुष्माण्डा
इनके ध्यान का मंत्र है:-
”सुरासम्पूर्णकलशं रूधिराप्लुतमेव च।
दधानाहस्तपद्याभ्यां कुष्माण्डा शुभदास्तु में॥“
इनकी आराधना से मनुष्य त्रिविध ताप से मुक्त होता है। माँ कुष्माण्डा सदैव अपने भक्तों पर कृपा दृष्टि रखती है। इनकी पूजा आराधना से हृदय को शांति एवं लक्ष्मी की प्राप्ति होती हैं।
पंचम स्कन्दमाता
इनके ध्यान का मंत्र है:-
“सिंहासनगता नित्यं पद्याञ्चितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥“
इनकी आराधना से मनुष्य सुख-शांति की प्राप्ति करता है। सिह के आसन पर विराजमान तथा कमल के पुष्प से सुशोभित दो हाथो वाली यशस्विनी देवी स्कन्दमाता शुभदायिनी है।
षष्ठ्म कात्यायनी
इनके ध्यान का मंत्र है:-
“चन्द्रहासोज्जवलकरा शार्दूलावरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्यादेवी दानव घातिनी॥“
इनकी आराधना से भक्त का हर काम सरल एवं सुगम होता है। चन्द्रहास नामक तलवार के प्रभाव से जिनका हाथ चमक रहा है, श्रेष्ठ सिंह जिसका वाहन है, ऐसी असुर संहारकारिणी देवी कात्यायनी कल्यान करें।
सप्तम कालरात्री
इनके ध्यान का मंत्र है:-
“एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टक भूषणा।
वर्धन्मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी॥“
संसार में कालो का नाश करने वाली देवी ‘कालरात्री’ ही है। भक्तों द्वारा इनकी पूजा के उपरांत उसके सभी दु:ख, संताप भगवती हर लेती है। दुश्मनों का नाश करती है तथा मनोवांछित फल प्रदान कर उपासक को संतुष्ट करती हैं।
अष्टम महागौरी
इनके ध्यान का मंत्र है:-
“श्वेत वृषे समारूढ़ा श्वेताम्बर धरा शुचि:।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेव प्रमोददा॥“
माँ महागौरी की आराधना से किसी प्रकार के रूप और मनोवांछित फल प्राप्त किया जा सकता है। उजले वस्त्र धारण किये हुए महादेव को आनंद देवे वाली शुद्धता मूर्ती देवी महागौरी मंगलदायिनी हों।
नवम सिद्धिदात्री
इनके ध्यान का मंत्र है:-
सिद्धिदात्री की कृपा से मनुष्य सभी प्रकार की सिद्धिया प्राप्त कर मोक्ष पाने मे सफल होता है। मार्कण्डेयपुराण में अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व एवं वशित्वये आठ सिद्धियाँ बतलायी गयी है। भगवती सिद्धिदात्री उपरोक्त संपूर्ण सिद्धियाँ अपने उपासको को प्रदान करती है।
माँ दुर्गा के इस अंतिम स्वरूप की आराधना के साथ ही नवरात्र के अनुष्ठान का समापन हो जाता है ।
“सिद्धगंधर्वयक्षादौर सुरैरमरै रवि।
सेव्यमाना सदाभूयात सिद्धिदा सिद्धिदायनी॥“
सेव्यमाना सदाभूयात सिद्धिदा सिद्धिदायनी॥“
सिद्धिदात्री की कृपा से मनुष्य सभी प्रकार की सिद्धिया प्राप्त कर मोक्ष पाने मे सफल होता है। मार्कण्डेयपुराण में अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व एवं वशित्वये आठ सिद्धियाँ बतलायी गयी है। भगवती सिद्धिदात्री उपरोक्त संपूर्ण सिद्धियाँ अपने उपासको को प्रदान करती है।
माँ दुर्गा के इस अंतिम स्वरूप की आराधना के साथ ही नवरात्र के अनुष्ठान का समापन हो जाता है ।
Sunday, September 12, 2010
भगवान श्री विश्वकर्मा जी की पूजा -17 सितम्बर को
प्रभात पुत्र विश्वकर्मा को आदि विश्वकर्मा मानतें हैं।
स्कंद पुराण प्रभात खण्ड के निम्न श्लोक की भांति किंचित पाठ भेद से सभी पुराणों में यह श्लोक मिलता हैः-
बृहस्पते भगिनी भुवना ब्रह्मवादिनी ।
प्रभासस्य तस्य भार्या बसूनामष्टमस्य च ।
विश्वकर्मा सुतस्तस्यशिल्पकर्ता प्रजापतिः ।।16।।
महर्षि अंगिरा के ज्येष्ठ पुत्र बृहस्पति की बहन भुवना जो ब्रह्मविद्या जानने वाली थी वह अष्टम् वसु महर्षि प्रभास की पत्नी बनी और उससे सम्पुर्ण शिल्प विद्या के ज्ञाता प्रजापति विश्वकर्मा का जन्म हुआ। पुराणों में कहीं योगसिद्धा, वरस्त्री नाम भी बृहस्पति की बहन का लिखा है। शिल्प शास्त्र का कर्ता वह ईश विश्वकर्मा देवताओं का आचार्य है, सम्पूर्ण सिद्धियों का जनक है,वह प्रभास ऋषि का पुत्र है और महर्षि अंगिरा के ज्येष्ठ पुत्र का भानजा है। अर्थात अंगिरा का दौहितृ (दोहिता) है। अंगिरा कुल से विश्वकर्मा का सम्बन्ध तो सभी विद्वान स्वीकार करते हैं। जिस तरह भारत मे विश्वकर्मा को शिल्पशस्त्र का अविष्कार करने वाला देवता माना जाता हे और सभी कारीगर उनकी पुजा करते हे। उसी तरह चीन मे लु पान को बदइयों का देवता माना जाता है। प्राचीन ग्रन्थों के मनन-अनुशीलन से यह विदित होता है कि जहाँ ब्रहा, विष्णु ओर महेश की वन्दना-अर्चना हुई है, वही भनवान विश्वकर्मा को भी स्मरण-परिष्टवन किया गया है। " विश्वकर्मा" शब्द से ही यह अर्थ-व्यंजित होता है "विशवं कृत्स्नं कर्म व्यापारो वा यस्य सः"अर्थातः जिसकी सम्यक् सृष्टि और कर्म व्यापार है वह विश्वकर्मा है। यही विश्वकर्मा प्रभु है, प्रभूत पराक्रम-प्रतिपत्र, विशवरुप विशवात्मा है। वेदो मे " विशवतः चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वस्पात्" कहकर इनकी सर्वव्यापकता, सर्वज्ञता, शक्ति-सम्पन्ता और अनन्तता दर्शायी गयी है। हमारा उद्देश्य तो यहाँ विश्वकर्मा जी का परिचय कराना है। माना कई विश्वकर्मा हुए हैं और आगे चलकर विश्वकर्मा के गुणों को धारण करने वाले श्रेष्ठ पुरुष को विश्वकर्मा की उपाधि से अलंकृत किया जाने लगा हो तो यह बात भी मानी जानी चाहिए। हमारी भारतीय संस्कृति के अंतर्गत भी शिल्प संकायो, कारखानो, उद्योगों में भगवान विश्वकर्मा की महता को प्रगट करते हुए प्रत्येक वर्ग 17 सितम्बर को "श्रम दिवस" के रुप मे मनाता है । यह उत्पादन-वृदि ओर राष्टीय समृध्दि के लिए एक संकलप दिवस है। यह पर्व हमारे देश में प्रतिवर्ष 17 सितम्बर "विश्वकर्मा-पूजा" के रुप में सरकारी व गैर सरकारी ईंजीनियरिंग संस्थानो मे बडे ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है ।
Thursday, September 9, 2010
श्री गणेश चतुर्थी - गणेश महोत्सव का पर्व
देश में गणेश महोत्सव का पर्व शनिवार को शुरू हो रहा है। विध्न विनाशक भगवान गणेश जी की पूजा धूमधाम से की जायेगी। गाँव हो या शहर हर जगह श्रि गणेश स्थापना पूजा पंडाल बनाये गये हैं, जहां विधि विधान से गणपति की स्थापना एवम पूजा-आराधना की जायेगी । गणेश पूजन कर एक्कीस दुर्वाकुंर, मोदक लड्डू आदि का भोग लगाने का विधान है। गणेश चौथ पर चौक-चांदनी का विधान पहले गुरुकुलों में चलता था, जो अब समाप्त हो गया है। गणेश चतुर्थी में ग्यारह दिवसीय पूजन महोत्सव मनाया जाता है। बाल गंगाधर तिलक ने अठारवीं सदी में महाराष्ट्र के पुणे में गणेश महोत्सव की सामूहिक रूप से आयोजन की परंपरा शुरू की। जिसका लक्ष्य था देश में एकता स्थापित कर अंग्रजों से भारत को आजाद कराना । गणेश चतुर्थी का यह व्रत स्वतंत्रता संग्राम में अहम् भूमिका निभाया है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार भदवा चौथ का चंद्र रात्रि में नहीं देखा जाना चाहिए। भगवान श्री कृष्ण ने भूल वश भदवा चौथ का चांद देख लिया था। इसी चांद देखने से भगवान कृष्ण पर समन्तक मणि चुराने का भी आरोप लगा था। श्री कृष्ण भगवान गणेश के पूजन से आरोप मुक्त सिद्ध हुए, तब से परंपरा कायम है।धर्मशास्त्रों के अनुसार कृष्ण व शुक्ल पक्ष में आने वाली चतुर्थी तिथि के देवता भगवान गणेश हैं। इस तिथि को भगवान गणेश की आराधना करने से वे प्रसन्न होते हैं। लेकिन श्रावण के शुक्ल पक्ष में आने वाली चतुर्थी और भी विशेष है। इस दिन गणेश के साथ शंकर की पूजा भी करनी चाहिए। भगवान शंकर सभी देवों में पूजनीय हैं वहीं भगवान गणेश बुद्धि के देवता हैं। इस दिन भगवान शंकर को धतूरा व बिल्व पत्र तथा गणेश को दुर्वा व मोदक अर्पण से शिव व गणेश दोनों प्रसन्न होते हैं।
श्रावण शुक्ल चतुर्थी दूर्वा गणपति का व्रत भी किया जाता है। व्रत के लिए सोने की प्रतिमा और सोने की दूर्वा बनाई जाती है। विधिपूर्वक तीन या पांच वर्ष तक व्रत करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है।
शिवपुराणके अन्तर्गत रुद्रसंहिताके चतुर्थ (कुमार) खण्ड में यह वर्णन है कि माता पार्वती ने स्नान करने से पूर्व अपनी मैल से एक बालक को उत्पन्न करके उसे अपना द्वारपालबना दिया। शिवजी ने जब प्रवेश करना चाहा तब बालक ने उन्हें रोक दिया। इस पर शिवगणोंने बालक से भयंकर युद्ध किया परंतु संग्राम में उसे कोई पराजित नहीं कर सका। अन्ततोगत्वा भगवान शंकर ने क्रोधित होकर अपने त्रिशूल से उस बालक का सर काट दिया। इससे भगवती शिवा क्रुद्ध हो उठीं और उन्होंने प्रलय करने की ठान ली। भयभीत देवताओं ने देवर्षिनारद की सलाह पर जगदम्बा की स्तुति करके उन्हें शांत किया। शिवजी के निर्देश पर विष्णुजीउत्तर दिशा में सबसे पहले मिले जीव (हाथी) का सिर काटकर ले आए। मृत्युंजय रुद्र ने गज के उस मस्तक को बालक के धड पर रखकर उसे पुनर्जीवित कर दिया। माता पार्वती ने हर्षातिरेक से उस गजमुखबालक को अपने हृदय से लगा लिया और देवताओं में अग्रणी होने का आशीर्वाद दिया। ब्रह्मा, विष्णु, महेश ने उस बालक को सर्वाध्यक्ष घोषित करके अग्रपूज्यहोने का वरदान दिया। भगवान शंकर ने बालक से कहा-गिरिजानन्दन! विघ्न नाश करने में तेरा नाम सर्वोपरि होगा। तू सबका पूज्य बनकर मेरे समस्त गणों का अध्यक्ष हो जा। गणेश्वर!तू भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी को चंद्रमा के उदित होने पर उत्पन्न हुआ है। इस तिथि में व्रत करने वाले के सभी विघ्नों का नाश हो जाएगा और उसे सब सिद्धियां प्राप्त होंगी। कृष्णपक्ष की चतुर्थी की रात्रि में चंद्रोदय के समय गणेश तुम्हारी पूजा करने के पश्चात् व्रती चंद्रमा को अर्घ्यदेकर ब्राह्मण को मिष्ठान खिलाए। तदोपरांत स्वयं भी मीठा भोजन करे। वर्षपर्यन्त श्रीगणेश चतुर्थी का व्रत करने वाले की मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है।
हरितालिका तीज व्रत - पूजा
देश के कुछ भाग में यह पर्व आज 10 सितम्बर तो कुछ जगह 11 सितम्बर को मनाया जा रहा है । भविष्योत्तर पुराण के अनुसार भाद्र पद की शुक्ल तृतीया को हरितालिका व्रत किया जता है । इसमें मुहूर्त मात्र हो तो भी बाद की तिथि ग्राह्य की जाती है , क्योंकि द्वितीया पितामह और चतुर्थी पुत्र की तिथि है अतः द्वितीया का योग निषेध एवम चतुर्थी का योग श्रेष्ठ माना जाता है ।( इस वर्ष यह योग 11 सितम्बर को है)
यह व्रत स्त्रियों के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है। इसे सबसे पहले गिरिराज हिमालय की पुत्री उमा (पार्वती) ने किया था, जिसके फलस्वरूप भगवान शंकर उन्हें पति के रूप में प्राप्त हुए। व्रत की कथा से भगवती पार्वती की कठोर तपस्या, भोले नाथ शिव के प्रति उनकी दृढ निष्ठा, उनके असीम धैर्य व संयम तथा पतिव्रता के धर्म का परिचय मिलता है। कथा के श्रवण का उद्देश्य स्त्री के मनोबल को ऊंचा उठाना है। कथा का सार-संक्षेप यह है-पूर्वकाल में जब दक्षकन्या सती पिता के यज्ञ में अपने पति भगवान शिव की उपेक्षा होने पर भी पहुंच गई, तब उन्हें बडा तिरस्कार सहना पडा। पिता के यहां पति का अपमान देखकर वह इतनी क्षुब्ध हुई कि उन्होंने अपने आप को योगाग्निमें भस्म कर दिया। बाद में वे आदिशक्ति ही मैना और हिमाचल की तपस्या से संतुष्ट होकर उनके यहां पुत्री के रूप में प्रकट हुई। उस कन्या का नाम पार्वती पड़ा । इस जन्म में भी उनकी पूर्व-स्मृति अक्षुण्ण बनी रही और वे सदा भगवान शंकर के ध्यान में ही मग्न रहतीं। मनोनुकूल वर की प्राप्ति के लिए पार्वती जी तपस्यारत हो गई। पुत्री को अति कठोर तप करते देख पिता हिमाचल चिन्तित हो उठे। उन्होंने देवर्षि नारद के परामर्श पर अपनी बेटी उमा का विवाह भगवान विष्णु से करने का निश्चय किया। भगवान शिव की अनन्य उपासिका पार्वती को जब यह समाचार मिला तो उन्हें बडा आघात लगा। वे मुर्क्षित होकर पृथ्वी पर गिर पडीं। सखियों के उपचार से होश में आने पर उन्होंने उनसे अपने मन की बात बताई कि वे शिव शंकर जी के अलावा अन्य किसी से भी कदापि विवाह नहीं करेंगी। शिव जी के प्रति उमा के अनन्य प्रेम को जानकर सखियां बोलीं,-तुम्हारे पिता विष्णु जी के साथ विवाह कराने हेतु तुम्हें लेने के लिए आते ही होंगे। आओ जल्दी चलो, हम तुम्हें लेकर किसी घने जंगल में छुप जाएं। इस प्रकार सखियों के द्वारा हरण करने की तरह उमा को ले जाये जाने के कारण ही इस व्रत का नाम हरितालिका पडा- आलिभिर्हरितायस्मात्तस्मात्सा हरितालिका।
गहन वन की एक पर्वतीय कन्दरा के भीतर पार्वती जी ने शिवजी की बालू की मुर्ति बनाकर उनका पूजन किया। उस दिन भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की तृतीया थी। उमा ने निर्जल-निराहार व्रत करते हुए दिन-रात शिव नाम-मंत्र का जप किया। पार्वती की सच्ची भक्ति एवं संकल्प की दृढता से प्रसन्न होकर सदा शिवप्रकट हो गए और उन्होंने उमा को पत्नी के रूप में वरण करना स्वीकार कर लिया। भाद्रपद शुक्ल तृतीया के दिन पार्वती की दुष्कर तपस्या सफल हुई थी, तब से यह पावन तिथि स्त्रियों के लिए सौभाग्यदायिनी हो गई। सुहागिनें अपने पति की दीर्घायु और अखण्ड सौभाग्य की कामना से इस दिन बडी आस्था के साथ व्रत करती हैं। कुंवारी कन्याएं भी मनोवांछित वर की प्राप्ति हेतु यह व्रत बडे उत्साह के साथ करती हैं। स्त्रियां अपने परिवार में प्रचलित प्रथा के अनुसार हरितालिका तीज का व्रतोत्सव मनाती हैं। महिलाएं इस दिन नए वस्त्र को धारण करके पूजा करती हैं। मिट्टी की शिव-पार्वती की मूर्तियों का विधिवत पूजन करके हरितालिका तीज की कथा को सुना जाता है। भवानी माता को सुहाग का सारा सामान चढाया जाता है। इस व्रत के शास्त्रोक्त विधान में तो इस दिन निर्जल उपवास का ही निर्देश है।
जिन कन्याओं के विवाह में विघ्न-बाधा के कारण अनावश्यक विलम्ब हो रहा हो वे युवतियां भाद्रपद शुक्ल तृतीया (हरितालिका तीज)के दिन जगदम्बा पार्वती का पूजन एवं व्रत करें ।
यह व्रत स्त्रियों के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है। इसे सबसे पहले गिरिराज हिमालय की पुत्री उमा (पार्वती) ने किया था, जिसके फलस्वरूप भगवान शंकर उन्हें पति के रूप में प्राप्त हुए। व्रत की कथा से भगवती पार्वती की कठोर तपस्या, भोले नाथ शिव के प्रति उनकी दृढ निष्ठा, उनके असीम धैर्य व संयम तथा पतिव्रता के धर्म का परिचय मिलता है। कथा के श्रवण का उद्देश्य स्त्री के मनोबल को ऊंचा उठाना है। कथा का सार-संक्षेप यह है-पूर्वकाल में जब दक्षकन्या सती पिता के यज्ञ में अपने पति भगवान शिव की उपेक्षा होने पर भी पहुंच गई, तब उन्हें बडा तिरस्कार सहना पडा। पिता के यहां पति का अपमान देखकर वह इतनी क्षुब्ध हुई कि उन्होंने अपने आप को योगाग्निमें भस्म कर दिया। बाद में वे आदिशक्ति ही मैना और हिमाचल की तपस्या से संतुष्ट होकर उनके यहां पुत्री के रूप में प्रकट हुई। उस कन्या का नाम पार्वती पड़ा । इस जन्म में भी उनकी पूर्व-स्मृति अक्षुण्ण बनी रही और वे सदा भगवान शंकर के ध्यान में ही मग्न रहतीं। मनोनुकूल वर की प्राप्ति के लिए पार्वती जी तपस्यारत हो गई। पुत्री को अति कठोर तप करते देख पिता हिमाचल चिन्तित हो उठे। उन्होंने देवर्षि नारद के परामर्श पर अपनी बेटी उमा का विवाह भगवान विष्णु से करने का निश्चय किया। भगवान शिव की अनन्य उपासिका पार्वती को जब यह समाचार मिला तो उन्हें बडा आघात लगा। वे मुर्क्षित होकर पृथ्वी पर गिर पडीं। सखियों के उपचार से होश में आने पर उन्होंने उनसे अपने मन की बात बताई कि वे शिव शंकर जी के अलावा अन्य किसी से भी कदापि विवाह नहीं करेंगी। शिव जी के प्रति उमा के अनन्य प्रेम को जानकर सखियां बोलीं,-तुम्हारे पिता विष्णु जी के साथ विवाह कराने हेतु तुम्हें लेने के लिए आते ही होंगे। आओ जल्दी चलो, हम तुम्हें लेकर किसी घने जंगल में छुप जाएं। इस प्रकार सखियों के द्वारा हरण करने की तरह उमा को ले जाये जाने के कारण ही इस व्रत का नाम हरितालिका पडा- आलिभिर्हरितायस्मात्तस्मात्सा हरितालिका।
गहन वन की एक पर्वतीय कन्दरा के भीतर पार्वती जी ने शिवजी की बालू की मुर्ति बनाकर उनका पूजन किया। उस दिन भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की तृतीया थी। उमा ने निर्जल-निराहार व्रत करते हुए दिन-रात शिव नाम-मंत्र का जप किया। पार्वती की सच्ची भक्ति एवं संकल्प की दृढता से प्रसन्न होकर सदा शिवप्रकट हो गए और उन्होंने उमा को पत्नी के रूप में वरण करना स्वीकार कर लिया। भाद्रपद शुक्ल तृतीया के दिन पार्वती की दुष्कर तपस्या सफल हुई थी, तब से यह पावन तिथि स्त्रियों के लिए सौभाग्यदायिनी हो गई। सुहागिनें अपने पति की दीर्घायु और अखण्ड सौभाग्य की कामना से इस दिन बडी आस्था के साथ व्रत करती हैं। कुंवारी कन्याएं भी मनोवांछित वर की प्राप्ति हेतु यह व्रत बडे उत्साह के साथ करती हैं। स्त्रियां अपने परिवार में प्रचलित प्रथा के अनुसार हरितालिका तीज का व्रतोत्सव मनाती हैं। महिलाएं इस दिन नए वस्त्र को धारण करके पूजा करती हैं। मिट्टी की शिव-पार्वती की मूर्तियों का विधिवत पूजन करके हरितालिका तीज की कथा को सुना जाता है। भवानी माता को सुहाग का सारा सामान चढाया जाता है। इस व्रत के शास्त्रोक्त विधान में तो इस दिन निर्जल उपवास का ही निर्देश है।
जिन कन्याओं के विवाह में विघ्न-बाधा के कारण अनावश्यक विलम्ब हो रहा हो वे युवतियां भाद्रपद शुक्ल तृतीया (हरितालिका तीज)के दिन जगदम्बा पार्वती का पूजन एवं व्रत करें ।
Wednesday, August 25, 2010
बृहस्पति को गुरू क्यों कहते हैं !
खगोल शास्त्र और ज्योतिष में सौरमंडल के नौ ग्रहों में सूर्य सहित शुक्र और बृहस्पति आते हैं। सप्ताह के सात दिनों का नामकरण में भी इन तीनों से तीन दिनों का नाम जु़डा हुआ है। परस्पर तीनों की तुलना में सूर्य सर्वाधिक प्रकाशवान हैं, सबसे बडे़ और सबसे भारी हैं। बृहस्पति ग्रह का एक पर्यायवाची शब्द जो प्रचलन में व्यापक देखने को मिलता है वह गुरू शब्द है। गुरू शब्द के अनेक अर्थ होते हैं जिनमें आधार भूत अर्थ जो अधंकार को मिटाये, भारी, ब़डा इत्यादि हैं।
पौराणिक साहित्य में देवताओं के गुरू बृहस्पति हैं और असुरों के गुरू शुक्र शुक्राचार्य हैं। अत: इन तीनों यथा सूर्य, बृहस्पति और शुक्र में गुरू का संबोधन सूर्य को न दिया जाकर बृहस्पति को क्यों दिया गया है? यह एक सहज जिज्ञासा है। बृहस्पति को गुरू नामकरण दिया जाना निरर्थक नहीं हो सकता है अपितु उसमें कोई सार्थकता अवश्य है वह सार्थकता क्या हो सकती है और वह कितनी हितकारी हो सकती है यह जानने के लिए गुरू शब्द की पवित्रता और महानता की पृष्ठभूमि को जानना आवश्यक प्रतीत होता है।
गुरू शब्द का प्रयोग भौतिक, दैविक और आध्यात्मिक स्तर पर किया जाता है। भौतिक और दैविक स्तर अपरा जगत के अंतर्गत हैं और आध्यात्म को परास्तर पर व्यक्त किया जाता है। इन्हीं को पांच कोष अथवा सात लोकों के रूप में भी व्यक्त किया गया है यथा अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय कोश हैं तथा भू, भुव:, स्व: जन, मह, तप और सत्य लोक हैं। इनमें मनोमय को चन्द्रलोक तथा विज्ञानमय को सूर्य लोक भी कहा गया है। आनंदमय कोश का स्थान सत्यलोक माना गया है। भारतीय परम्परा में विश्व शांति हेतु भौतिक, दैविक और आध्यात्मिक शांति हेतु एकरूपता बनाए रखते हुए। ईश्वर से प्रार्थना की जाती है यथा ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:।
आध्यात्म का स्तर सूर्य और चन्द्रमा के लोकों से भी कहीं आगे तक जाता है। अत: गुरू संबोधन सूर्य अथवा चंद्रमा को नहीं दिया गया। दैविक स्तर पर सतयुग की गाथाएं देव और असुरों के मध्य परस्पर संघषो का वर्णन करती हैं। संघष से अशांति ही उत्पन्न होती हैं अत: अधिदैविक स्तर पर शांति हेतु मार्गदर्शन कौन करें- देवगुरू बृहस्पति या असुर गुरू शुक्राचार्यक् गुरूपद की मर्यादा की पवित्रता के अनुरूप यद्यपि देव और असुर परस्पर शत्रु थे किन्तु उनके गुरू बृहस्पति और शुक्र के संबंध आत्मीय थे।
भौतिक जगत में जहाँ संपूर्ण संसार धन-संपत्ति और सांसारिक सुखों की कामना करता है वहाँ जगद्गुरू शंकराचार्य ने गुरू प्रशस्ति पर संस्कृत भाषा में दो अष्टक लिखे हैं। एक अष्टक में गुरू तत्व का विवेचन करते हुये श्री सत्यदेव को समर्पित किया है जिनका निरंतर स्मरण बना रहना चाहिए। दूसरे अष्टक में श्री गुरू के चरण कमल की तुलना में संपूर्ण संसार की निस्सारता को व्यक्त किया है। आध्यात्म के जिज्ञासुओं के लिये ये अमूल्य योगदान है।
[ ---वीरेन्द्र नाथ भार्गव
पौराणिक साहित्य में देवताओं के गुरू बृहस्पति हैं और असुरों के गुरू शुक्र शुक्राचार्य हैं। अत: इन तीनों यथा सूर्य, बृहस्पति और शुक्र में गुरू का संबोधन सूर्य को न दिया जाकर बृहस्पति को क्यों दिया गया है? यह एक सहज जिज्ञासा है। बृहस्पति को गुरू नामकरण दिया जाना निरर्थक नहीं हो सकता है अपितु उसमें कोई सार्थकता अवश्य है वह सार्थकता क्या हो सकती है और वह कितनी हितकारी हो सकती है यह जानने के लिए गुरू शब्द की पवित्रता और महानता की पृष्ठभूमि को जानना आवश्यक प्रतीत होता है।
गुरू शब्द का प्रयोग भौतिक, दैविक और आध्यात्मिक स्तर पर किया जाता है। भौतिक और दैविक स्तर अपरा जगत के अंतर्गत हैं और आध्यात्म को परास्तर पर व्यक्त किया जाता है। इन्हीं को पांच कोष अथवा सात लोकों के रूप में भी व्यक्त किया गया है यथा अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय कोश हैं तथा भू, भुव:, स्व: जन, मह, तप और सत्य लोक हैं। इनमें मनोमय को चन्द्रलोक तथा विज्ञानमय को सूर्य लोक भी कहा गया है। आनंदमय कोश का स्थान सत्यलोक माना गया है। भारतीय परम्परा में विश्व शांति हेतु भौतिक, दैविक और आध्यात्मिक शांति हेतु एकरूपता बनाए रखते हुए। ईश्वर से प्रार्थना की जाती है यथा ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:।
आध्यात्म का स्तर सूर्य और चन्द्रमा के लोकों से भी कहीं आगे तक जाता है। अत: गुरू संबोधन सूर्य अथवा चंद्रमा को नहीं दिया गया। दैविक स्तर पर सतयुग की गाथाएं देव और असुरों के मध्य परस्पर संघषो का वर्णन करती हैं। संघष से अशांति ही उत्पन्न होती हैं अत: अधिदैविक स्तर पर शांति हेतु मार्गदर्शन कौन करें- देवगुरू बृहस्पति या असुर गुरू शुक्राचार्यक् गुरूपद की मर्यादा की पवित्रता के अनुरूप यद्यपि देव और असुर परस्पर शत्रु थे किन्तु उनके गुरू बृहस्पति और शुक्र के संबंध आत्मीय थे।
भौतिक जगत में जहाँ संपूर्ण संसार धन-संपत्ति और सांसारिक सुखों की कामना करता है वहाँ जगद्गुरू शंकराचार्य ने गुरू प्रशस्ति पर संस्कृत भाषा में दो अष्टक लिखे हैं। एक अष्टक में गुरू तत्व का विवेचन करते हुये श्री सत्यदेव को समर्पित किया है जिनका निरंतर स्मरण बना रहना चाहिए। दूसरे अष्टक में श्री गुरू के चरण कमल की तुलना में संपूर्ण संसार की निस्सारता को व्यक्त किया है। आध्यात्म के जिज्ञासुओं के लिये ये अमूल्य योगदान है।
[ ---वीरेन्द्र नाथ भार्गव
Thursday, August 19, 2010
रक्षाबंधन
प्राचीनकाल में रक्षाबंधन मुख्यत: ब्राह्मणों का, विजयदशमी क्षत्रियों, दीपावली वैश्यों और होली शूद्रों का त्यौहार माना जाता था। प्रतिवर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन ब्राह्मण अपने यजमानों के दाहिने हाथ पर एक सूत्र बांधते थे, जिसे रक्षासूत्र कहा जाता था। इसे ही आगे चलकर राखी जाने लगा। यह भी कहा जाता है कि यज्ञ में जो यज्ञसूत्र बांधा जाता था उसे आगे चलकर रक्षासूत्र कहा जाने लगा।रक्षाबंधन की सामाजिक लोकप्रियता कब प्रारंभ हुई, यह कहना कठिन है। कुछ पौराणिक कथाओं में इसका जिक्र है जिसके अनुसार भगवान विष्णु के वामनावतार ने भी राजा बलि के रक्षासूत्र बांधा था और उसके बाद ही उन्हें पाताल जाने का आदेश दिया था। आज भी रक्षासूत्र बांधते समय एक मंत्र बोला जाता है उसमें इसी घटना का जिक्र होता है। परंपरागत मान्यता के अनुसार रक्षाबंधन का संबंध एक पौराणिक कथा से माना जाता है, जो कृष्ण व युधिष्ठिर के संवाद के रूप में भविष्योत्तर पुराण में वर्णित बताई जाती है। इसमें राक्षसों से इंद्रलोक को बचाने के लिए गुरु बृहस्पति ने इंद्राणी को एक उपाय बतलाया था जिसमें श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को इंद्राणी ने इंद्र के तिलक लगाकर उसके रक्षासूत्र बांधा था जिससे इंद्र विजयी हुए। वर्तमानकाल में परिवार में किसी या सभी पूज्य और आदरणीय लोगों को रक्षासूत्र बाँधने की परंपरा भी है। वृक्षों की रक्षा के लिए वृक्षों को रक्षासूत्र तथा परिवार की रक्षा के लिए माँ को रक्षासूत्र बाँधने के दृष्टांत भी मिलते हैं।
रक्षासूत्र का मंत्र और उद्देश्य
रक्षासूत्र का मंत्र है- येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:। तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।
इस मंत्र का सामान्यत: यह अर्थ लिया जाता है कि दानवों के महाबली राजा बलि जिससे बांधे गए थे, उसी से तुम्हें बांधता हूं। हे रक्षे!(रक्षासूत्र) तुम चलायमान न हो, चलायमान न हो। धर्मशास्त्र के विद्वानों के अनुसार इसका अर्थ यह है कि रक्षा सूत्र बांधते समय ब्राह्मण या पुरोहत अपने यजमान को कहता है कि जिस रक्षासूत्र से दानवों के महापराक्रमी राजा बलि धर्म के बंधन में बांधे गए थे अर्थात् धर्म में प्रयुक्त किए गये थे, उसी सूत्र से मैं तुम्हें बांधता हूं, यानी धर्म के लिए प्रतिबद्ध करता हूं। इसके बाद पुरोहित रक्षा सूत्र से कहता है कि हे रक्षे तुम स्थिर रहना, स्थिर रहना। इस प्रकार रक्षा सूत्र का उद्देश्य ब्राह्मणों द्वारा अपने यजमानों को धर्म के लिए प्रेरित एवं प्रयुक्त करना है।
मौली या कलावा जिससे रक्षासूत्र बनता है
शास्त्रों में कहा गया है - इस दिन अपरान्ह में रक्षासूत्र का पूजन करे और उसके उपरांत रक्षाबंधन का विधान है। यह रक्षाबंधन राजा को पुरोहित द्वारा यजमान के ब्राह्मण द्वारा, भाई के बहिन द्वारा और पति के पत्नी द्वारा दाहिनी कलाई पर किया जाता है. संस्कृत की उक्ति के अनुसार -
"जनेन विधिना यस्तु रक्षाबंधनमाचरेत। स सर्वदोष रहित, सुखी संवतसरे भवेत्।।"
अर्थात् इस प्रकार विधिपूर्वक जिसके रक्षाबंधन किया जाता है वह संपूर्ण दोषों से दूर रहकर संपूर्ण वर्ष सुखी रहता है। रक्षाबंधन में मूलत: दो भावनाएं काम करती रही हैं. प्रथम जिस व्यक्ति के रक्षाबंधन किया जाता है उसकी कल्याण कामना और दूसरे रक्षाबंधन करने वाले के प्रति स्नेह भावना। इस प्रकार रक्षाबंधन वास्तव में स्नेह, शांति और रक्षा का बंधन है। इसमें सबके सुख और कल्याण की भावना निहित है। सूत्र का अर्थ धागा भी होता है और सिद्धांत या मंत्र भी। पुराणों में देवताओं या ऋषियों द्वारा जिस रक्षासूत्र बांधने की बात की गई हैं वह धागे की बजाय कोई मंत्र या गुप्त सूत्र भी हो सकता है। धागा केवल उसका प्रतीक है। रक्षासूत्र बाँधते समय एक श्लोक और पढ़ा जाता है जो इस प्रकार है-
ओम यदाबध्नन्दाक्षायणा हिरण्यं, शतानीकाय सुमनस्यमाना:। तन्मआबध्नामि शतशारदाय, आयुष्मांजरदृष्टिर्यथासम्।।
मोतियों से बनी अनेक प्रकार की राखियाँ
साधारण मौली की राखियाँ भी बाज़ार में मिलती हैं। छोटे बच्चों के लिए उपहार युक्त राखियां, जिसमें रौशनी वाले खिलौने, टेडी बियर, इलेक्ट्रानिक उपकरण व चाकलेट लगी राखियाँ भी बाज़ार में मिलती हैं। बड़ों के लिए चंदन, कीमती नगों, सिंदूर, चावल तथा सोन व चाँदी के ब्रेसलेट लोगों में खूब लोकप्रिय हैं। इसके अतिरिक्त रंगीन धागे, मोती व चंदन जड़ित धागे डाक से भेजे जाने के लिए अधिक पसंद किए जाते हैं। अनेक रक्षासूत्रों पर भगवान के भी दर्शन होते हैं। राखियों पर संप्रदाय के अनुरूप देवी-देवताओं की प्रतिमा उकेरी और चित्र चिपकाए जाते हैं। दूर-दराज व विदेशों में भेजने के अभिनंदन पत्रों के साथ भी राखियां भी मिलती हैं। इसमें भाइयों के लिए राखी के साथ शुभकामना संदेश भी होते है। इसके अलावा सुनार और आभूषणों की दूकानों पर चाँदी, डायमंड, अमरीकन ज़रीकन, रुद्राक्ष से मंडित राखियाँ विभिन्न डिज़ाइनों एवं रंगों में उपलब्ध हैं।
भारत में विदेशी राखियाँ भी काफ़ी लोकप्रिय हैं। आमतौर पर इलेक्ट्रॉनिक सामान की नकल करने में मशहूर चीन अब राखी कारोबार में भी फल-फूल रहा है। इन राखियों में साटन के धागों में छोटे-छोटे खिलौने, गाड़ियाँ, फुटबॉल, टेडिबियर, गुड्डे-गुड़िया, सुपरमैन और रंग-बिरंगे फूल बँधे हुए हैं। यहाँ तक कि बच्चों के लिए धागों पर चूहे को भी विराजमान कर दिया गया है।
बहनों की व्यस्तता को देखते हुए भारत का डाक विभाग ऐसे लिफ़ाफ़े बिक्री के लिए जारी करता है, जिन पर बहन को केवल भाई का पता भर लिखना होता है। इनमें राखी, रोली व चावल सहित सभी सामग्री पहले से होती है। इसके अलावा वाटर प्रूफ़ लिफ़ाफ़े भी जारी किए जाते हैं। कुछ लिफ़ाफ़े ऐसे भी तैयार कराए जाते हैं जिनमें राखी सहित सभी सामग्री होती है। इनकी बिक्री अनेक मुख्य या प्रधान डाकघरों द्वारा की जाती है। डाक छँटाई के दौरान राखी डाक का विशेष ध्यान रखा जाता है।
रक्षासूत्र का मंत्र और उद्देश्य
रक्षासूत्र का मंत्र है- येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:। तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।
इस मंत्र का सामान्यत: यह अर्थ लिया जाता है कि दानवों के महाबली राजा बलि जिससे बांधे गए थे, उसी से तुम्हें बांधता हूं। हे रक्षे!(रक्षासूत्र) तुम चलायमान न हो, चलायमान न हो। धर्मशास्त्र के विद्वानों के अनुसार इसका अर्थ यह है कि रक्षा सूत्र बांधते समय ब्राह्मण या पुरोहत अपने यजमान को कहता है कि जिस रक्षासूत्र से दानवों के महापराक्रमी राजा बलि धर्म के बंधन में बांधे गए थे अर्थात् धर्म में प्रयुक्त किए गये थे, उसी सूत्र से मैं तुम्हें बांधता हूं, यानी धर्म के लिए प्रतिबद्ध करता हूं। इसके बाद पुरोहित रक्षा सूत्र से कहता है कि हे रक्षे तुम स्थिर रहना, स्थिर रहना। इस प्रकार रक्षा सूत्र का उद्देश्य ब्राह्मणों द्वारा अपने यजमानों को धर्म के लिए प्रेरित एवं प्रयुक्त करना है।
मौली या कलावा जिससे रक्षासूत्र बनता है
शास्त्रों में कहा गया है - इस दिन अपरान्ह में रक्षासूत्र का पूजन करे और उसके उपरांत रक्षाबंधन का विधान है। यह रक्षाबंधन राजा को पुरोहित द्वारा यजमान के ब्राह्मण द्वारा, भाई के बहिन द्वारा और पति के पत्नी द्वारा दाहिनी कलाई पर किया जाता है. संस्कृत की उक्ति के अनुसार -
"जनेन विधिना यस्तु रक्षाबंधनमाचरेत। स सर्वदोष रहित, सुखी संवतसरे भवेत्।।"
अर्थात् इस प्रकार विधिपूर्वक जिसके रक्षाबंधन किया जाता है वह संपूर्ण दोषों से दूर रहकर संपूर्ण वर्ष सुखी रहता है। रक्षाबंधन में मूलत: दो भावनाएं काम करती रही हैं. प्रथम जिस व्यक्ति के रक्षाबंधन किया जाता है उसकी कल्याण कामना और दूसरे रक्षाबंधन करने वाले के प्रति स्नेह भावना। इस प्रकार रक्षाबंधन वास्तव में स्नेह, शांति और रक्षा का बंधन है। इसमें सबके सुख और कल्याण की भावना निहित है। सूत्र का अर्थ धागा भी होता है और सिद्धांत या मंत्र भी। पुराणों में देवताओं या ऋषियों द्वारा जिस रक्षासूत्र बांधने की बात की गई हैं वह धागे की बजाय कोई मंत्र या गुप्त सूत्र भी हो सकता है। धागा केवल उसका प्रतीक है। रक्षासूत्र बाँधते समय एक श्लोक और पढ़ा जाता है जो इस प्रकार है-
ओम यदाबध्नन्दाक्षायणा हिरण्यं, शतानीकाय सुमनस्यमाना:। तन्मआबध्नामि शतशारदाय, आयुष्मांजरदृष्टिर्यथासम्।।
मोतियों से बनी अनेक प्रकार की राखियाँ
साधारण मौली की राखियाँ भी बाज़ार में मिलती हैं। छोटे बच्चों के लिए उपहार युक्त राखियां, जिसमें रौशनी वाले खिलौने, टेडी बियर, इलेक्ट्रानिक उपकरण व चाकलेट लगी राखियाँ भी बाज़ार में मिलती हैं। बड़ों के लिए चंदन, कीमती नगों, सिंदूर, चावल तथा सोन व चाँदी के ब्रेसलेट लोगों में खूब लोकप्रिय हैं। इसके अतिरिक्त रंगीन धागे, मोती व चंदन जड़ित धागे डाक से भेजे जाने के लिए अधिक पसंद किए जाते हैं। अनेक रक्षासूत्रों पर भगवान के भी दर्शन होते हैं। राखियों पर संप्रदाय के अनुरूप देवी-देवताओं की प्रतिमा उकेरी और चित्र चिपकाए जाते हैं। दूर-दराज व विदेशों में भेजने के अभिनंदन पत्रों के साथ भी राखियां भी मिलती हैं। इसमें भाइयों के लिए राखी के साथ शुभकामना संदेश भी होते है। इसके अलावा सुनार और आभूषणों की दूकानों पर चाँदी, डायमंड, अमरीकन ज़रीकन, रुद्राक्ष से मंडित राखियाँ विभिन्न डिज़ाइनों एवं रंगों में उपलब्ध हैं।
भारत में विदेशी राखियाँ भी काफ़ी लोकप्रिय हैं। आमतौर पर इलेक्ट्रॉनिक सामान की नकल करने में मशहूर चीन अब राखी कारोबार में भी फल-फूल रहा है। इन राखियों में साटन के धागों में छोटे-छोटे खिलौने, गाड़ियाँ, फुटबॉल, टेडिबियर, गुड्डे-गुड़िया, सुपरमैन और रंग-बिरंगे फूल बँधे हुए हैं। यहाँ तक कि बच्चों के लिए धागों पर चूहे को भी विराजमान कर दिया गया है।
बहनों की व्यस्तता को देखते हुए भारत का डाक विभाग ऐसे लिफ़ाफ़े बिक्री के लिए जारी करता है, जिन पर बहन को केवल भाई का पता भर लिखना होता है। इनमें राखी, रोली व चावल सहित सभी सामग्री पहले से होती है। इसके अलावा वाटर प्रूफ़ लिफ़ाफ़े भी जारी किए जाते हैं। कुछ लिफ़ाफ़े ऐसे भी तैयार कराए जाते हैं जिनमें राखी सहित सभी सामग्री होती है। इनकी बिक्री अनेक मुख्य या प्रधान डाकघरों द्वारा की जाती है। डाक छँटाई के दौरान राखी डाक का विशेष ध्यान रखा जाता है।
Tuesday, August 3, 2010
पति की दीर्घायु कामना के लिए व्रत - सोमवती अमावस्या (09 अगस्त 2010)
सोमवती अमावस्या (09 अगस्त 2010) सोमवार को पड़ने वाली अमावस्या को सोमवती अमावस्या कहा जाता है । विवाहित स्त्रियों द्वारा इस दिन अपने पतियों के दीर्घायु कामना के लिए व्रत का विधान है. कुछ परम्पराओं में इस दिन विवाहित स्त्रियों द्वारा पीपल के वृक्ष की दूध, जल, पुष्प, अक्षत, चन्दन इत्यादि से पूजा और वृक्ष के चारों ओर १०८ बार धागा लपेट कर परिक्रमा करने का विधान है । कहीं - कहीं 14 परिक्रमा करने का भी विधान है । धान, पान और खड़ी हल्दी को मिला कर उसे विधान पूर्वक तुलसी के पेड़ को चढाया जाता है । इस दिन पवित्र नदियों में स्नान का भी विशेष महत्व समझा जाता है. कहा जाता है कि महाभारत में भीष्म ने युधिष्ठिर को इस दिन का महत्व समझाते हुए कहा था कि, इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने वाला मनुष्य समृद्ध, स्वस्थ्य और सभी दुखों से मुक्त होगा. ऐसा भी माना जाता है कि स्नान करने से पितरों कि आत्माओं को शांति मिलती है।
सोमवती अमावस्या कथा -सोमवती अमावस्या से सम्बंधित अनेक कथाएँ प्रचलित हैं। परंपरा है कि सोमवती अमावस्या के दिन इन कथाओं को विधिपूर्वक सुना जाता है। कथा है - "एक गरीब ब्राह्मण परिवार था, जिसमे पति, पत्नी के अलावा एक पुत्री भी थी। पुत्री धीरे धीरे बड़ी होने लगी. उस लड़की में समय के साथ सभी स्त्रियोचित गुणों का विकास हो रहा था। लड़की सुन्दर, संस्कारवान एवं गुणवान भी थी, लेकिन गरीब होने के कारण उसका विवाह नहीं हो पा रहा था. एक दिन ब्राह्मण के घर एक साधू पधारे, जो कि कन्या के सेवाभाव से काफी प्रसन्न हुए। कन्या को लम्बी आयु का आशीर्वाद देते हुए साधू ने कहा की कन्या के हथेली में विवाह योग्य रेखा नहीं है। ब्राह्मण दम्पति ने साधू से उपाय पूछा कि कन्या ऐसा क्या करे की उसके हाथ में विवाह योग बन जाए। साधू ने कुछ देर विचार करने के बाद अपनी अंतर्दृष्टि से ध्यान करके बताया कि कुछ दूरी पर एक गाँव में सोना नाम की धोबिन जाती की एक महिला अपने बेटे और बहू के साथ रहती है, जो की बहुत ही आचार- विचार और संस्कार संपन्न तथा पति परायण है। यदि यह कन्या उसकी सेवा करे और वह महिला इसकी शादी में अपने मांग का सिन्दूर लगा दे, उसके बाद इस कन्या का विवाह हो तो इस कन्या का वैधव्य योग मिट सकता है। साधू ने यह भी बताया कि वह महिला कहीं आती जाती नहीं है। यह बात सुनकर ब्राह्मणी ने अपनी बेटी से धोबिन कि सेवा करने कि बात कही। कन्या तडके ही उठ कर सोना धोबिन के घर जाकर, सफाई और अन्य सारे करके अपने घर वापस आ जाती। सोना धोबिन अपनी बहू से पूछती है कि तुम तो तडके ही उठकर सारे काम कर लेती हो और पता भी नहीं चलता। बहू ने कहा कि माँजी मैंने तो सोचा कि आप ही सुबह उठकर सारे काम ख़ुद ही ख़तम कर लेती हैं। मैं तो देर से उठती हूँ। इस पर दोनों सास बहू निगरानी करने करने लगी कि कौन है जो तडके ही घर का सारा काम करके चला जाता हा। कई दिनों के बाद धोबिन ने देखा कि एक एक कन्या मुँह अंधेरे घर में आती है और सारे काम करने के बाद चली जाती है। जब वह जाने लगी तो सोना धोबिन उसके पैरों पर गिर पड़ी, पूछने लगी कि आप कौन है और इस तरह छुपकर मेरे घर की चाकरी क्यों करती हैं। तब कन्या ने साधू द्बारा कही गई साड़ी बात बताई। सोना धोबिन पति परायण थी, उसमें तेज था। वह तैयार हो गई। सोना धोबिन के पति थोड़ा अस्वस्थ थे। उसमे अपनी बहू से अपने लौट आने तक घर पर ही रहने को कहा। सोना धोबिन ने जैसे ही अपने मांग का सिन्दूर कन्या की मांग में लगाया, उसके पति की मृत्यु हो गई । उसे इस बात का पता चल गया। वह घर से निराजल ही चली थी, यह सोचकर की रास्ते में कहीं पीपल का पेड़ मिलेगा तो उसकी परिक्रमा करके ही जल ग्रहण करेगी.उस दिन सोमवती अमावस्या थी। ब्राह्मण के घर मिले पूए- पकवान की जगह उसने ईंट के टुकडों से १०८ बार पीपल के पेड़ की परिक्रमा की, और उसके बाद जल ग्रहण किया। ऐसा करते ही उसका पति जीवित हो गया । पीपल के पेड़ में सभी देवों का वास होता है। अतः, सोमवती अमावस्या के दिन से शुरू करके जो व्यक्ति हर अमावस्या के दिन परिक्रमा करता है, उसके सुख और सौभाग्य में वृद्धि होती है। जो हर अमावस्या को न कर सके, वह सोमवार को पड़ने वाली अमावस्या के दिन १०८ वस्तुओं कि फ़ैरी देकर सोना धोबिन और गौरी-गणेश कि पूजा करता है, उसे अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है।ऐसी परम्परा है कि पहली सोमवती अमावस्या के दिन धान, पान, हल्दी, सिन्दूर और सुपाड़ी की भँवरी दी जाती है। उसके बाद की सोमवती अमावस्या को अपने सामर्थ्य के हिसाब से फल, मिठाई, सुहाग सामग्री, खाने की सामग्री इत्यादि की फ़ैरी में दी जाती है। परिक्रमा करने पर चढाया गया सामान किसी सुपात्र ब्राह्मण, ननद या भांजे को दिया जा सकता है।
Monday, August 2, 2010
पितृ दोष से मुक्ति के लिए नाग पंचमी पर जरूर करें पूजा
इस वर्ष नाग पंचमी पर्व 14 अगस्त शनिवार को, परंपरागत तरीके से मनाया जाएगा। इस दिन घरों में प्रतीक रूप से नाग पूजा की जाएगी। मान्यताओं के अनुसार पितृ दोष से मुक्ति के लिए इस दिन उनकी पूजा का विधान किया गया है । नागपंचमी पर नाग की पूजा प्रत्यक्ष मूर्ति या चित्रों के रूप में की जाती है। इसी दिन सर्पो के प्रतीक रूप को दूध से स्नान करा कर उनकी पूजा करने का विधान है । दूध पिलाने से, वासुकी कुंड में स्नान करने, निज गृह के द्वार में दोनों और गोबर के सर्प बनाकर उनका दही, दु़र्वा, कुशा, गंध, अक्षत, पुष्प, मोदक और मालपुओं आदि से पूजा करने से घर में सर्पो का भय नहीं होता। भगवान विष्णु की शैया "अनन्त" नामक नागराज की है। धर्म ग्रंथों में उल्लेख है कि - महाभारत में कृष्ण और अजरुन ने भी मणिनाग की पूजा की। बौद्ध व जैन धर्म के अनुसार मुचलिंद नाग ने फन फैलाकर भगवान बुद्ध और भगवान पाश्र्वनाथ की भी तपस्या के दौरान धूप व हवा से रक्षा की थी। वेद-पुराणों के अनुसार नागों की उत्पति महर्षि कश्यप की पत्नी कद्रु से हुई, इनका निवास स्थान पाताल लोक है।नाग पंचमी पर्व पर शिव आराधना करें -
नाग पंचमी के दिन नाग की पूजा के साथ-साथ नागों के देवता देवाधिदेव महादेव की भी पूजा करना चाहिए। पंडितों ने बताया कि काल सर्प दोष निवारण के लिए नाग पंचमी के दिन नागनुमा अंगूठी बनवाकर उसकी प्राण-प्रतिष्ठा कर उसे धारण करें। इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में तांबे का सर्प बनवाकर उसकी पूजा करके शिवलिंग पर चढ़ाएं तथा इससे पूर्व एक रात उसे घर में ही रखें। नाग पंचमी को एक नाग-नागिन सपेरों से बंधन मुक्त कराने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है । इस मौके पर नागावली और नारायण नागावली का जप करें। "ऊं नम: शिवाय मंत्र" का जाप करें। राहु कवच या राहु स्त्रोत का पाठ करें। सत्यमुखी रुद्राक्ष गले में पहने तथा काल सर्प योग के साथ-साथ चंद्र राहु, चंद्र केतु, सूर्य-केतु, एक भी ग्रह योग हो तो केतु का रत्न लहसुनिया मध्यमा अंगुली में पहनें। इसके अलावा घर व कार्यालय में मोर पंख रखें व कालसर्प निदान के लिए शांति विधान करें। चंदन की लकड़ी पर चांदी का जोड़ा बनवाकर पूजा करके धारण करें।
शुभ भी होता है कालसर्प योग
गरुड़ पुराण के अनुसार नाग-पंचमी के दिन नाग देवता की पूजा करने से सुख-शांति की प्राप्ति होती है। राहु को सर्प का मुख और केतु को उसकी पूंछ माना जाता है। जब भी समस्त ग्रह इन दोनों ग्रहों के मध्य में आते हैं तो वह कालसर्प योग कहलाता है। कालसर्प योग शुभ व अशुभ दोनों प्रकार के होते हैं। इसकी शुभता और अशुभता अन्य ग्रहों के योगों पर निर्भर करती है। जब भी कालसर्प योग में पंच महापुरुष योग, रुचक, भद्र, मालव्य व शश योग, गज केसरी, राज सम्मान योग महाधनपति योग बनें तो व्यक्ति उन्नति करता है।
जब कालसर्प योग के साथ अशुभ योग बने जैसे-ग्रहण, चाण्डाल, अशांरक, जड़त्व, नंदा, अंभोत्कम, कपर, क्रोध, पिशाच हो तो वह अनिष्टकारी होता है। ज्योतिषशास्त्र में 576 प्रकार के कालसर्प योग बताए गए हैं जिनमें लग्न से द्वादश स्थान तक मुख्यत: 12 प्रकार के सर्प योगों में अन्नत, कुलिक, वासुकी, शंखपाल, पदम, महापदम, तक्षक, कर्कोटक, शंखनाद, पातक, विशान्त तथा शेषनाग शामिल है। कालसर्प योग दोष निवारण के लिए नागपंचमी के दिन सर्प की पूजा करना सर्वाधिक अच्छा रहता है
Sunday, July 25, 2010
शिव की कृपा बरसाने आया सावन
शिव की कृपा बरसाने आया सावन । शिव परम तत्त्व हैं और उन्हें शक्ति प्रदान करने वाली जगतजननी मां जगदम्बा परमेश्वरी। जब जीवात्मा में शिव तत्त्व का प्रवेश होता है, तभी जीव शक्ति को समझ पाता है। शिव और शक्ति के इसी रहस्य को जानने का महीना है सावन। भारतीय परंपरा में सावन के कई रूप हैं, लेकिन यहां हम देवभूमि में प्रचलित सावन के रहस्यों को ही उजागर करेंगे। संवत्सरीय गणना के अनुसार देवभूमि में सावन की शुरुआत कर्क यानी हरियाली संक्रांति से होती है। यह चातुर्मास का पहला महीना भी है। कहते हैं कि चातुर्मास में श्रीहरि राजा बलि को दिए गए वचन के अनुसार पाताल में विश्राम करते हैं। इसलिए इस अवधि सिर्फ भगवान आशुतोष की ही पूजा होती है। यूं तो शिव और सावन एक-दूसरे के पर्याय हैं, लेकिन शिव को सोमवार अत्यंत प्रिय है, जो आज पड़ रहा है। इस दौरान हजारों शिवभक्त शिवलिंग का जलाभिषेक करेंगे, जिसकी तैयारियां द्रोणनगरी के प्रमुख शिवालयों में कर ली गई हैं। शिव को जानने के लिए उनकी प्रकृति को समझना आवश्यक है। समस्त प्राणियों के एकमात्र आश्रयदाता शिव ही हैं। वे रुद्र भी कहलाते हैं, जिनके समीप पहुंचकर सारे दु:ख खत्म हो जाते हैं। शिव का एक नाम हर भी है, वे सबके दु:खों को हरते हैं। शिव नीलकंठ हैं, जो विश्व के कल्याण के लिए विष का पान कर लेते हैं। वे कर्पूर गौरं हैं, मतलब सारे सद्गुण उन्हीं से प्रकट होते हैं। उनके गले में सर्पो की माला सुशोभित है, जो यह दर्शाती है कि अपने जीवन में कष्टों को भी गले से लगाए रखो। कानों में बिच्छू और बर्र के कुंडल, यानी कटु शब्दों को सहने की क्षमता। इसी तरह मुंडों की माला और भस्म लेपन जीव की अंतिम अवस्था का द्योतक है। शिव प्रलय के देवता कहे गए हैं। इस दृष्टि से वे तमोगुण के अधिष्ठाता हुए, लेकिन पुराणों में विष्णु और शिव को अभिन्न माना गया है। इसीलिए विष्णु का वर्ण शिव में दृष्टिगोचर होता है, जबकि शिव की नीलिमा विष्णु में। शिव शांत हैं और रुद्र भी। वे श्रीराम के आराध्य हैं तो रावण ने भी अजेय शक्ति व गुह्य विद्याएं उन्हीं से प्राप्त कीं। शिव पूजन की विधि व्रत धारण कर पहले प्रहर में स्नान करके पशुपतये नम: का उच्चारण करते हुए स्वच्छ आसन पर बैठकर पूरब या उत्तर की ओर मुख कर संकल्प करें और कहें - मैं शिव की संतुष्टि हेतु व्रत रखकर शिवपूजन कर रहा हूं। शिवलिंग पर केवल पंचामृत (दूध, दही, शहद, घी, शक्कर व गंगाजल), बेलपत्र, कनेर श्वेतार्क (सफेद आखा) व धतूरे के फूल, कमलगट्टा व नीलकमल चढ़ाकर पूजन करना चाहिए। शिवभक्त को रुद्राक्ष अवश्य धारण करना चाहिए। दिव्य पांच वस्तुओं से मिश्रित पंचामृत या गंगाजल से शिवलिंग को स्नान कराते समय ॐ नम: शिवाय का जाप करते रहें। पंचामृत की अलग-अलग दिव्य वस्तुओं से शिवलिंग को स्नान कराना हो तो इस तरह मंत्रोच्चार करें: ॐ ईशानाय नम:, ॐ अघोराय नम:, ॐ वासुदेवाय नम:, ॐ सद्योजाताय नम:, ॐ तत्पुरुषाय नम:। ऐसे होगी सर्वकार्य सिद्धि सावन के महीने में किसी भी कार्यसिद्धि हेतु पंचाक्षरी मंत्र ॐ नम: शिवाय का शिव मंदिर में बैठकर नित्य जप करते रहें और 100 माला जप कर चुकें तब ॐ शिवाय स्वाहा कहकर हवन करना चाहिए। राहुकाल में न करें जलाभिषेक यूं तो जलाभिषेक किसी भी वक्त करने की कोई मनाही नहीं है, लेकिन पंचांगीय दृष्टि से राहुकाल को इसके लिए निषेध माना गया है। आज राहुकाल प्रात: 7.30 से 9.00 बजे तक रहेगा, जबकि गुलीक काल (शुभ समय) दोपहर 1.30 से 3.00 बजे तक है। एक बात और। प्रतिदिन 11.37 से 12.24 बजे तक अभिजित नक्षत्र रहता है। इस दौरान सभी ग्रह-नक्षत्र निस्तेज हो जाते हैं। इस अवधि में भी जलाभिषेक करना श्रेष्ठ है। वर्जित हैं अभक्ष्य पदार्थ वैसे तो अभक्ष्य (तामसी वृत्ति वाले) पदार्थो, यानी मांस-मदिरा आदि का सेवन सर्वकालिक वर्जित है, लेकिन सावन के महीने तो इनके बारे में सोचना भी पाप माना गया है। इसके अलावा सरसों के तेल को भी निषेध किया गया है। इसलिए सात्विक रहकर ही शिव पूजन करना चाहिए।
रुद्राक्ष की उत्पत्ति और महत्व
रुद्राक्ष की उत्पत्ति शिव के आंसुओं से मानी जाती है। इस बारे में पुराण में एक कथा प्रचलित है। कहते हैं एक बार भगवान शिव ने अपने मन को वश में कर दुनिया के कल्याण के लिए सैकड़ों सालों तक तप किया। एक दिन अचानक ही उनका मन दु:खी हो गया। जब उन्होंने अपनी आंखें खोलीं तो उनमें से कुछ आंसू की बूंदे गिर गई। इन्हीं आंसू की बूदों से रुद्राक्ष नामक वृक्ष उत्पन्न हुआ। शिव भगवान हमेशा ही अपने भक्तों पर कृपा करते हैं। उनकी लीला से ही उनके आंसू ठोस आकार लेकर स्थिर(जड़) हो गए। जनधारणा है कि यदि शिव-पार्वती को प्रसन्न करना हो तो रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। एक मुखी रूद्राक्ष के चक्कर में कदापि न पडें ,यह दुर्लभ है , अधिकांश लोग रुद्राक्ष की श्रेणी
रुद्राक्ष को आकार के हिसाब से तीन भागों में बांटा गया है-
1- उत्तम श्रेणी- जो रुद्राक्ष आकार में आंवले के फल के बराबर हो वह सबसे उत्तम माना गया है।
2- मध्यम श्रेणी- जिस रुद्राक्ष का आकार बेर के फल के समान हो वह मध्यम श्रेणी में आता है।
3- निम्न श्रेणी- चने के बराबर आकार वाले रुद्राक्ष को निम्न श्रेणी में गिना जाता है।
जिस रुद्राक्ष को कीड़ों ने खराब कर दिया हो या टूटा-फूटा हो, या पूरा गोल न हो। जिसमें उभरे हुए दाने न हों। ऐसा रुद्राक्ष नहीं पहनना चाहिए।वहीं जिस रुद्राक्ष में अपने आप डोरा पिरोने के लिए छेद हो गया हो, वह उत्तम होता है।
मंत्र शक्तियों पर भरोसा करना चाहिए
इंसान सोचता कुछ है और होता कुछ और ही है, इंसान को नजर कुछ और आता है तथा निकलता कुछ और है। इस दुनिया जहान में जाने कितने ऐसे रहस्य हैं जिनसे अभी पर्दा उठना बाकी है। कई बार लाख प्रयास करने के बावजूद कोई सफलता हाथ नहीं लगती, तो कभी बिना हाथ हिलाए ही हर रुकावट दूर हो जाती है तथा जीवन में सफलताओं की झड़ी लग जाती है। ऐसे में वैज्ञानिक सोच वाले आधुनिक मनुष्य को भी इन अद्भुत रहस्य भरी बातों और चमत्कारों पर भरोसा करना ही पड़ता है। कुछ ऐसे विलक्षण उपाय जो दीखने में भले ही अतिसामान्य प्रतीत होते हैं किन्तु परिणाम में उतने ही कारगर एवं असरदार होते हैं। श्री राम के अनन्य भक्त एवं साधक गोस्वामी तुलसीदास द्वारा लिखी गई रामायण की कुछ चौपाइयां ऐसी हैं जो आश्चर्यजनक रुप से सिद्ध मंत्रों की तरह चमत्कारी असर करती हैं। हर इंसान के जीवन में अनचाहे ही कुछ विकट समस्याएं आ जाती हैं, जिनसे छुटकारा पाने के लिये उपायों को ईश्वर की कृपा मानकर अवश्य प्रयोग करें ।
Tuesday, July 20, 2010
सुखी जीवन के लिये वास्तु
यद्यपि गृहस्थ जीवन में या व्याहारिक जीवन में कोई भी छोटा सा कारण एक बड़े कारण में परिवर्तित हो जाता है। चाहे वह आर्थिक हो या घर के अन्य सदस्यों को लेकर हो। इसका सीधा प्रभाव पति-पत्नी के आपसी रिश्तों पर पड़ता है। इसलिए घर का वातावरण ऐसा होना चाहिए कि ऋणात्मक उर्जा कम हो और सकारात्मक उर्जा अधिक क्रियाशील हों । ऐसा वास्तु के द्वारा संभव
हो सकता है।घर के ईशान कोण का बहुत ही महत्व है। यदि पति-पत्नी साथ बैठकर पूजा करें तो उनका आपस का मन मुटाव सतत कम होने लगता है खत्म होकर संबंधों में मधुरता बढ़ेगी। गृहलक्ष्मी द्वारा संध्या के समय तुलसी में दीपक जलाने से नकारात्मक शक्तियों को कम किया जा सकता है। घर के हर कमरे के ईशान कोण को साफ रखें, विशेषकर शयनकक्ष के।पति-पत्नी में आपस में मन मुटाव का एक कारण सही दिशा में शयनकक्ष का न होना भी है। अगर दक्षिण-पश्चिम दिशाओं में स्थित कोने में बने कमरों में आपकी आवास व्यवस्था नहीं है तो संबंध बहुत अच्छे नही रहते हैं।दक्षिण दिशा का स्वामी यम, शक्ति एवं विश्रामदायक है। घर में आराम से सोने के लिए दक्षिण एवं नैऋत्य कोण उपयुक्त माना गया है। शयनकक्ष में पति-पत्नी का सामान्य फोटो होने के बजाए हंसता हुआ हो, तो अच्छा माना जाता है ।घर के अंदर घर के ईशान कोण में अगर शौचालय है तो पति-पत्नी का जीवन बड़ा अशांत रहता है। आर्थिक संकट व संतान सुख में कमी आती है। इसलिए शौचालय हटा देना ही उचित है। अगर हटाना संभव न हो तो शीशे के एक बर्तन में समुद्री नमक रखें। यह अगर सील जाए तो बदल दें। अगर यह संभव न हो तो मिट्टी के एक बर्तन में सेंधा नमक डालकर रखें।घर के अंदर यदि रसोई सही दिशा में नहीं है तो ऐसी अवस्था में पति-पत्नी के विचार कभी नहीं मिलेंगे। रिश्तों में कड़वाहट दिनों-दिन बढ़ेगी। कारण अग्नि का कहीं
ओर जलना। रसोई घर की सही दिशा है आग्नेय कोण। अगर आग्नेय दिशा में संभव नहीं है तो अन्य वैकल्पिक दिशाएं हैं। आग्नेय एवं दक्षिण के बीच, आग्नेय एवं पूर्व के बीच, वायव्य एवं उत्तर के बीच।जीवन को सुखद एवं समृद्ध बनाना चाहते हैं और अपेक्षा करते हैं कि जीवन के सुंदर स्वप्न को साकार कर सकें। इसके लिए पूर्ण निष्ठा एवं श्रद्धा से वास्तु के उपायों को अपनाकर अपने जीवन में खुशहाली लाएं। प्रभु के प्रति श्रद्धावनत रहें ,कल्याण सुनिश्चित है ।
हो सकता है।घर के ईशान कोण का बहुत ही महत्व है। यदि पति-पत्नी साथ बैठकर पूजा करें तो उनका आपस का मन मुटाव सतत कम होने लगता है खत्म होकर संबंधों में मधुरता बढ़ेगी। गृहलक्ष्मी द्वारा संध्या के समय तुलसी में दीपक जलाने से नकारात्मक शक्तियों को कम किया जा सकता है। घर के हर कमरे के ईशान कोण को साफ रखें, विशेषकर शयनकक्ष के।पति-पत्नी में आपस में मन मुटाव का एक कारण सही दिशा में शयनकक्ष का न होना भी है। अगर दक्षिण-पश्चिम दिशाओं में स्थित कोने में बने कमरों में आपकी आवास व्यवस्था नहीं है तो संबंध बहुत अच्छे नही रहते हैं।दक्षिण दिशा का स्वामी यम, शक्ति एवं विश्रामदायक है। घर में आराम से सोने के लिए दक्षिण एवं नैऋत्य कोण उपयुक्त माना गया है। शयनकक्ष में पति-पत्नी का सामान्य फोटो होने के बजाए हंसता हुआ हो, तो अच्छा माना जाता है ।घर के अंदर घर के ईशान कोण में अगर शौचालय है तो पति-पत्नी का जीवन बड़ा अशांत रहता है। आर्थिक संकट व संतान सुख में कमी आती है। इसलिए शौचालय हटा देना ही उचित है। अगर हटाना संभव न हो तो शीशे के एक बर्तन में समुद्री नमक रखें। यह अगर सील जाए तो बदल दें। अगर यह संभव न हो तो मिट्टी के एक बर्तन में सेंधा नमक डालकर रखें।घर के अंदर यदि रसोई सही दिशा में नहीं है तो ऐसी अवस्था में पति-पत्नी के विचार कभी नहीं मिलेंगे। रिश्तों में कड़वाहट दिनों-दिन बढ़ेगी। कारण अग्नि का कहीं
ओर जलना। रसोई घर की सही दिशा है आग्नेय कोण। अगर आग्नेय दिशा में संभव नहीं है तो अन्य वैकल्पिक दिशाएं हैं। आग्नेय एवं दक्षिण के बीच, आग्नेय एवं पूर्व के बीच, वायव्य एवं उत्तर के बीच।जीवन को सुखद एवं समृद्ध बनाना चाहते हैं और अपेक्षा करते हैं कि जीवन के सुंदर स्वप्न को साकार कर सकें। इसके लिए पूर्ण निष्ठा एवं श्रद्धा से वास्तु के उपायों को अपनाकर अपने जीवन में खुशहाली लाएं। प्रभु के प्रति श्रद्धावनत रहें ,कल्याण सुनिश्चित है ।
Monday, July 19, 2010
दाम्पत्य सुख के लिए कुछ कारगर उपाय
१॰ यदि जन्म कुण्डली में प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, द्वादश स्थान स्थित मंगल होने से जातक को मंगली योग होता है इस योग के होने से जातक के विवाह में विलम्ब, विवाहोपरान्त पति-पत्नी में कलह, पति या पत्नी के स्वास्थ्य में क्षीणता, तलाक एवं क्रूर मंगली होने पर जीवन साथी की मृत्यु तक हो सकती है। अतः जातक मंगल व्रत। मंगल मंत्र का जप, घट विवाह आदि करें।
२॰ सप्तम गत शनि स्थित होने से विवाह बाधक होते है। अतः “ॐ शं शनैश्चराय नमः” मन्त्र का जप ७६००० एवं ७६०० हवन शमी की लकड़ी, घृत, मधु एवं मिश्री से करवा दें।
३॰ राहु या केतु होने से विवाह में बाधा या विवाहोपरान्त कलह होता है। यदि राहु के सप्तम स्थान में हो, तो राहु मन्त्र “ॐ रां राहवे नमः” का ७२००० जप तथा दूर्वा, घृत, मधु व मिश्री से दशांश हवन करवा दें। केतु स्थित हो, तो केतु मन्त्र “ॐ कें केतवे नमः” का २८००० जप तथा कुश, घृत, मधु व मिश्री से दशांश हवन करवा दें।
४॰ सप्तम भावगत सूर्य स्थित होने से पति-पत्नी में अलगाव एवं तलाक पैदा करता है। अतः जातक आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ रविवार से प्रारम्भ करके प्रत्येक दिन करे तथा रविवार कप नमक रहित भोजन करें। सूर्य को प्रतिदिन जल में लाल चन्दन, लाल फूल, अक्षत मिलाकर तीन बार अर्ध्य दें।
५॰ जिस जातक को किसी भी कारणवश विवाह में विलम्ब हो रहा हो, तो नवरात्री में प्रतिपदा से लेकर नवमी तक ४४००० जप निम्न मन्त्र का दुर्गा जी की मूर्ति या चित्र के सम्मुख करें।
“ॐ पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्।
तारिणीं दुर्ग संसार सागरस्य कुलोद्भवाम्।।”
६॰ किसी स्त्री जातिका को अगर किसी कारणवश विवाह में विलम्ब हो रहा हो, तो श्रावण कृष्ण सोमवार से या नवरात्री में गौरी-पूजन करके निम्न मन्त्र का २१००० जप करना चाहिए-
“हे गौरि शंकरार्धांगि यथा त्वं शंकर प्रिया।
तथा मां कुरु कल्याणी कान्त कान्तां सुदुर्लभाम।।”
७॰ किसी लड़की के विवाह मे विलम्ब होता है तो नवरात्री के प्रथम दिन शुद्ध प्रतिष्ठित कात्यायनि यन्त्र एक चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर स्थापित करें एवं यन्त्र का पंचोपचार से पूजन करके निम्न मन्त्र का २१००० जइ लड़की स्वयं या किसी सुयोग्य पंडित से करवा सकते हैं।
“कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि।
नन्दगोप सुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः।।”
८॰ जन्म कुण्डली में सूर्य, शनि, मंगल, राहु एवं केतु आदि पाप ग्रहों के कारण विवाह में विलम्ब हो रहा हो, तो गौरी-शंकर रुद्राक्ष शुद्ध एवं प्राण-प्रतिष्ठित करवा कर निम्न मन्त्र का १००८ बार जप करके पीले धागे के साथ धारण करना चाहिए। गौरी-शंकर रुद्राक्ष सिर्फ जल्द विवाह ही नहीं करता बल्कि विवाहोपरान्त पति-पत्नी के बीच सुखमय स्थिति भी प्रदान करता है।
“ॐ सुभगामै च विद्महे काममालायै धीमहि तन्नो गौरी प्रचोदयात्।।”
९॰ “ॐ गौरी आवे शिव जी व्याहवे (अपना नाम) को विवाह तुरन्त सिद्ध करे, देर न करै, देर होय तो शिव जी का त्रिशूल पड़े। गुरु गोरखनाथ की दुहाई।।”
उक्त मन्त्र की ११ दिन तक लगातार १ माला रोज जप करें। दीपक और धूप जलाकर ११वें दिन एक मिट्टी के कुल्हड़ का मुंह लाल कपड़े में बांध दें। उस कुल्हड़ पर बाहर की तरफ ७ रोली की बिंदी बनाकर अपने आगे रखें और ऊपर दिये गये मन्त्र की ५ माला जप करें। चुपचाप कुल्हड़ को रात के समय किसी चौराहे पर रख आवें। पीछे मुड़कर न देखें। सारी रुकावट दूर होकर शीघ्र विवाह हो जाता है।
१०॰ जिस लड़की के विवाह में बाधा हो उसे मकान के वायव्य दिशा में सोना चाहिए।
११॰ लड़की के पिता जब जब लड़के वाले के यहाँ विवाह वार्ता के लिए जायें तो लड़की अपनी चोटी खुली रखे। जब तक पिता लौटकर घर न आ जाए तब तक चोटी नहीं बाँधनी चाहिए।
१२॰ लड़की गुरुवार को अपने तकिए के नीचे हल्दी की गांठ पीले वस्त्र में लपेट कर रखे।
१३॰ पीपल की जड़ में लगातार १३ दिन लड़की या लड़का जल चढ़ाए तो शादी की रुकावट दूर हो जाती है।
१४॰ विवाह में अप्रत्याशित विलम्ब हो और जातिकाएँ अपने अहं के कारण अनेल युवकों की स्वीकृति के बाद भी उन्हें अस्वीकार करती रहें तो उसे निम्न मन्त्र का १०८ बार जप प्रत्येक दिन किसी शुभ मुहूर्त्त से प्रारम्भ करके करना चाहिए।
“सिन्दूरपत्रं रजिकामदेहं दिव्ताम्बरं सिन्धुसमोहितांगम् सान्ध्यारुणं धनुः पंकजपुष्पबाणं पंचायुधं भुवन मोहन मोक्षणार्थम क्लैं मन्यथाम।
महाविष्णुस्वरुपाय महाविष्णु पुत्राय महापुरुषाय पतिसुखं मे शीघ्रं देहि देहि।।”
१५॰ किसी भी लड़के या लड़की को विवाह में बाधा आ रही हो यो विघ्नकर्ता गणेशजी की उपासना किसी भी चतुर्थी से प्रारम्भ करके अगले चतुर्थी तक एक मास करना चाहिए। इसके लिए स्फटिक, पारद या पीतल से बने गणेशजी की मूर्ति प्राण-प्रतिष्टित, कांसा की थाली में पश्चिमाभिमुख स्थापित करके स्वयं पूर्व की ओर मुँह करके जल, चन्दन, अक्षत, फूल, दूर्वा, धूप, दीप, नैवेद्य से पूजा करके १०८ बार “ॐ गं गणेशाय नमः” मन्त्र पढ़ते हुए गणेश जी पर १०८ दूर्वा चढ़ायें एवं नैवेद्य में मोतीचूर के दो लड्डू चढ़ायें। पूजा के बाद लड्डू बच्चों में बांट दें।
यह प्रयोग एक मास करना चाहिए। गणेशजी पर चढ़ये गये दूर्वा लड़की के पिता अपने जेब में दायीं तरफ लेकर लड़के के यहाँ विवाह वार्ता के लिए जायें।
१६॰ तुलसी के पौधे की १२ परिक्रमायें तथा अनन्तर दाहिने हाथ से दुग्ध और बायें हाथ से जलधारा तथा सूर्य को बारह बार इस मन्त्र से अर्ध्य दें- “ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय सहस्त्र किरणाय मम वांछित देहि-देहि स्वाहा।”
फिर इस मन्त्र का १०८ बार जप करें-
“ॐ देवेन्द्राणि नमस्तुभ्यं देवेन्द्र प्रिय यामिनि। विवाहं भाग्यमारोग्यं शीघ्रलाभं च देहि मे।”
१७॰ गुरुवार का व्रत करें एवं बृहस्पति मन्त्र के पाठ की एक माला आवृत्ति केला के पेड़ के नीचे बैठकर करें।
१८॰ कन्या का विवाह हो चुका हो और वह विदा हो रही हो तो एक लोटे में गंगाजल, थोड़ी-सी हल्दी, एक सिक्का डाल कर लड़की के सिर के ऊपर ७ बार घुमाकर उसके आगे फेंक दें। उसका वैवाहिक जीवन सुखी रहेगा।
१९॰ जो माता-पिता यह सोचते हैं कि उनकी पुत्रवधु सुन्दर, सुशील एवं होशियार हो तो उसके लिए वीरवार एवं रविवार के दिन अपने पुत्र के नाखून काटकर रसोई की आग में जला दें।
२०॰ विवाह में बाधाएँ आ रही हो तो गुरुवार से प्रारम्भ कर २१ दिन तक प्रतिदिन निम्न मन्त्र का जप १०८ बार करें-
“मरवानो हाथी जर्द अम्बारी। उस पर बैठी कमाल खां की सवारी। कमाल खां मुगल पठान। बैठ चबूतरे पढ़े कुरान। हजार काम दुनिया का करे एक काम मेरा कर। न करे तो तीन लाख पैंतीस हजार पैगम्बरों की दुहाई।”
२१॰ किसी भी शुक्रवार की रात्रि में स्नान के बाद १०८ बार स्फटिक माला से निम्न मन्त्र का जप करें-
“ॐ ऐं ऐ विवाह बाधा निवारणाय क्रीं क्रीं ॐ फट्।”
२२॰ लड़के के शीघ्र विवाह के लिए शुक्ल पक्ष के शुक्रवार को ७० ग्राम अरवा चावल, ७० सेमी॰ सफेद वस्त्र, ७ मिश्री के टुकड़े, ७ सफेद फूल, ७ छोटी इलायची, ७ सिक्के, ७ श्रीखंड चंदन की टुकड़ी, ७ जनेऊ। इन सबको सफेद वस्त्र में बांधकर विवाहेच्छु व्यक्ति घर के किसी सुरक्षित स्थान में शुक्रवार प्रातः स्नान करके इष्टदेव का ध्यान करके तथा मनोकामना कहकर पोटली को ऐसे स्थान पर रखें जहाँ किसी की दृष्टि न पड़े। यह पोटली ९० दिन तक रखें।
२३॰ लड़की के शीघ्र विवाह के लिए ७० ग्राम चने की दाल, ७० से॰मी॰ पीला वस्त्र, ७ पीले रंग में रंगा सिक्का, ७ सुपारी पीला रंग में रंगी, ७ गुड़ की डली, ७ पीले फूल, ७ हल्दी गांठ, ७ पीला जनेऊ- इन सबको पीले वस्त्र में बांधकर विवाहेच्छु जातिका घर के किसी सुरक्षित स्थान में गुरुवार प्रातः स्नान करके इष्टदेव का ध्यान करके तथा मनोकामना कहकर पोटली को ऐसे स्थान पर रखें जहाँ किसी की दृष्टि न पड़े। यह पोटली ९० दिन तक रखें।
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