छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से प्रकाशित धर्म , आध्यात्म , वास्तु शास्त्र एवम ज्योतिष पर आधारित मासिक पत्र।
Friday, January 14, 2011
Thursday, January 13, 2011
आईए जाने मकर संक्रांति के बाद बारह राशियों पर पड़ने वाला प्रभाव
इस वर्ष 2011 को 14 जनवरी की मध्य रात्रि सूर्य देव अपनी राशि बदलकर धनु राशि से मकर में प्रवेश करेंगे । सूर्य प्रत्येक ग्रह राशियों पर परिभ्रमण करते हैं और राशियों पर अपना शुभ-अशुभ प्रभाव डालते हैं। सूर्य जब मकर राशि पर परिभ्रमण करेंगे तो बारह राशियों पर क्या प्रभाव पड़ेगा आईये जानते हैं , यहाँ राशियों पर होने वाले प्रभाव एवम उनके लिए उपाय दिए गये हैं -
मेष- आर्थिक परेशानी के साथ स्वास्थ्य संबंधी तकलीफ देता है। मित्र या रिश्तेदारी में लड़ाई करा सकता है। आकस्मिक घटनाएँ होने की संभावना बनाता है।
उपाय- ॐ घृणि सूर्याय नम: बोलकर अर्घ्य दें।
वृषभ- मानसिक परेशानी के साथ धन हानि देता है। शत्रुओं से कष्ट दिला सकता है। शत्रु संख्या भी बढ़ा सकता है। फिजूलखर्च एवं मान-सम्मान में कभी कराता है।
उपाय- आदित्य स्त्रोतम् का पाठ करें। माणिक धारण करें।
मिथुन- इच्छाओं की पूर्ति कराएगा। नौकरी वालों को पदोन्नति दिलाएगा। सुख, शांति एवं समृद्धि प्रदान करेगा। पुरस्कार प्राप्त होगा।
उपाय- ताँबे की वस्तु का दान करें।
कर्क- बिछड़े एवं टूटे हुए साथियों को मिलवाएगा। नए संबंध बनाएगा, घर में मांगलिक कार्य होंगे। सुख-शांति प्रदान होगी।
सुझाव- गंगाजल से स्नान करें। तीर्थ यात्रा करें।
सिंह- मानसिक रोग में सुधार होगा। मकर का सूर्य वाहन-दुर्घटना अथवा सामान्य दुर्घटना करा सकता है। आर्थिक तंगी आएगी।
उपाय- माणिक, कमल फूल, गुड, लाल चंदन, लाल वस्त्र, ताँबा, केसर, स्वर्ण रविवार को दान करें।
कन्या- स्वभाव में उग्रता लाएगा। धन हानि के साथ-साथ मान-सम्मान में कमी ला सकता है। परिवार से दूरी के योग बना सकता है।
उपाय- माणिक के साथ सोना दान करें।
तुला- सामाजिक अथवा धार्मिक यात्रा का योग कराएगा। परंतु आर्थिक कष्ट के साथ परिवार से दूरी करा सकता है।
सुझाव- आदित्य स्त्रोतम् का पाठ करें।
वृश्चिक- उन्नति अर्थात् सु-व्यवस्थित पद दिलाएगा। परिवार में सुख-शांति एवं सम्मान में वृद्धि कराएगा। स्वास्थ्य सुधार होगा।
सुझाव- सूर्य का जप करें (ॐ सूर्याय नम:)।
धनु- वैवाहिक सुख में कमी करा सकता है। घर में अशांति के साथ बीमारी के कारण आर्थिक कष्ट कराएगा।
उपाय- लाल चंदन, ताँबा, गुड रविवार को दान करें।
मकर- अधिकारियों से परेशानी हो सकती है। दुर्घटना के योग बनते है। मानसिक परेशानी के साथ बीमारी का भय रहेगा।
उपाय- लाल फूल एवं कुँकू डालकर सूर्य को अर्घ्य दें।
कुंभ- शत्रुओं पर विजय प्राप्त कराएगा। मानसिक आर्थिक सुख शांति प्रदान करेगा। घर में खुशियाँ आएँगी।
सुझाव- स्नान में तीर्थ का जल मिलाएँ।
मीन- उदर अथवा मूत्राशय संबंधी तकलीफ दे सकता है। परिवार से तालमेल में कमी करा सकता है।
उपाय- लाल चंदन का दान करें। साथ ही आदित्य स्त्रोतम् का पाठ करें।
Monday, January 10, 2011
मकर संक्रांति अबकी बार 15 को
पौष शुक्ल दशमी शुक्रवार तदनुसार 14 जनवरी 2011 को रात्रि में 12 बजकर 31 मिनट पर सूर्य मकर राशि में प्रवेश कर रहा है। धर्मशास्त्रों के अनुसार मकर संक्रांति का पुण्य काल संक्रांति के पश्चात 16 घण्टा तक रहेगा । इस प्रकार मकर संक्रांति जन्म पुण्यकाल दूसरे दिन होना चाहिए। मकर संक्रांति जन्म पुण्यकाल पौष शुक्ला एकादशी शनिवार तद्नुसार 15 जनवरी को सायं 4 बजकर 31 मिनट तक रहेगा यानि उसी दिन मकर संक्रांति मनाई जायेगी। विशेष पुण्यकाल 15 की सुबह 08:15 तक रहेगा । दोपहर 12 बजे तक सामान्य पुण्यकाल रहेगा । इस पर्व पर छः प्रकार से तिल का प्रयोग करना लाभप्रद बताया गया है । तिल का उबटन , तिल मिले जल से स्नान , तिल से हवन , तिल का खाना , तिल मिला जल पीना और तिल का दान इस दिन अच्छा माना गया है । शुभम करोति ।
Sunday, January 9, 2011
Friday, January 7, 2011
Wednesday, January 5, 2011
कलियुग का आगमन
धर्मराज युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेव पाँचों पाण्डव महापराक्रमी परीक्षित को राज्य देकर महाप्रयाण हेतु उत्तराखंड की ओर चले गये और वहाँ जाकर पुण्यलोक को प्राप्त हुये। राजा परीक्षित धर्म के अनुसार तथा ब्राह्नणों की आज्ञानुसार शासन करने लगे। उत्तर नरेश की पुत्री इरावती के साथ उन्होंने अपना विवाह किया और उस उत्तम पत्नी से उनके चार पुत्र उत्पन्न हुये। आचार्य कृप को गुरु बना कर उन्होंने जाह्नवी के तट पर तीन अश्वमेघ यज्ञ किये। उन यज्ञों में अनन्त धन राशि ब्रह्मणों को दान में दी और दिग्विजय हेतु निकल गये।
उन्हीं दिनों धर्म ने बैल का रूप बना कर गौरूपिणी पृथ्वी से सरस्वती तट पर भेंट किया। गौरूपिणी पृथ्वी की नेत्रों से अश्रु बह रहे थे और वह श्रीहीन सी प्रतीत हो रही थी। धर्म ने पृथ्वी से पूछा - "हे देवि! तुम्हारा मुख मलिन क्यों हो रहा है? किस बात की तुम्हें चिन्ता है? कहीं तुम मेरी चिन्ता तो नहीं कर रही हो कि अब मेरा केवल एक पैर ही रह गया है या फिर तुम्हें इस बात की चिन्ता है कि अब तुम पर शूद्र राज्य करेंगे?"
पृथ्वी बोली - "हे धर्म! तुम सर्वज्ञ होकर भी मुझ से मेरे दुःख का कारण पूछते हो! सत्य, पवित्रता, क्षमा, दया, सन्तोष, त्याग, शम, दम, तप, सरलता, क्षमता, शास्त्र विचार, उपरति, तितिक्षा, ज्ञान, वैराग्य, शौर्य, तेज, ऐश्वर्य, बल, स्मृति, कान्ति, कौशल, स्वतन्त्रता, निर्भीकता, कोमलता, धैर्य, साहस, शील, विनय, सौभाग्य, उत्साह, गम्भीरता, कीर्ति, आस्तिकता, स्थिरता, गौरव, अहंकारहीनता आदि गुणों से युक्त भगवान श्रीकृष्ण के स्वधाम गमन के कारण घोर कलियुग मेरे ऊपर आ गया है। मुझे तुम्हारे साथ ही साथ देव, पितृगण, ऋषि, साधु, सन्यासी आदि सभी के लिये महान शोक है। भगवान श्रीकृष्ण के जिन चरणों की सेवा लक्ष्मी जी करती हैं उनमें कमल, वज्र, अंकुश, ध्वजा आदि के चिह्न विराजमान हैं और वे ही चरण मुझ पर पड़ते थे जिससे मैं सौभाग्यवती थी। अब मेरा सौभाग्य समाप्त हो गया है।"
जब धर्म और पृथ्वी ये बातें कर ही रहे थे कि मुकुटधारी शूद्र के रूप में कलियुग वहाँ आया और उन दोनों को मारने लगा।
अरे दुष्ट कलिकाल तू, देता दुःख महान।
पाण्डु पौत्र मारन चले, ले करमें धनुवान॥
राजा परीक्षित दिग्विजय करते हुये वहीं पर से गुजर रहे थे। उन्होंने मुकुटधारी शूद्र को हाथ में डण्डा लिये एक गाय और एक बैल को बुरी तरह पीटते देखा। वह बैल अत्यन्त सुन्दर था, उसका श्वेत रंग था और केवल एक पैर था। गाय भी कामधेनु के समान सुन्दर थी। दोनों ही भयभीत हो कर काँप रहे थे। महाराज परीक्षित अपने धनुषवाण को चढ़ाकर मेघ के समान गम्भीर वाणी में ललकारे - "रे दुष्ट! पापी! नराधम! तू कौन है? इन निरीह गाय तथा बैल क्यों सता रहा है? तू महान अपराधी है। तेरे अपराध का उचित दण्ड तेरा वध ही है।" उनके इन वचनों को सुन कर कलियुग भय से काँपने लगा।
महाराज ने बैल से पूछा कि हे बैल तुम्हारे तीन पैर कैस टूटे गये हैं। तुम बैल हो या कोई देवता हो। हे धेनुपुत्र! तुम निर्भीकतापूर्वक अपना अपना वृतान्त मुझे बताओ। हे गौमाता! अब तुम भयमुक्त हो जाओ। मैं दुष्टों को दण्ड देता हूँ। किस दुष्ट ने मेरे राज्य में घोर पाप कर के पाण्डवों की पवित्र कीर्ति में यह कलंक लगाया है? चाहे वह पापी साक्षात् देवता ही क्यों न हो मैं उसके भी हाथ काट दूँगा। तब धर्म बोला - "हे महाराज! आपने भगवान श्रीकृष्ण के परमभक्त पाण्डवों के कुल में जन्म लिया है अतः ये वचन आप ही के योग्य हैं। हे राजन्! हम यह नहीं जानते कि संसार के जीवों को कौन क्लेश देता है। शास्त्रों में भी इसका निरूपण अनेक प्रकार से किया गया है। जो द्वैत को नहीं मानता वह दुःख का कारण अपने आप को ही स्वीकार करता हैं। कोई प्रारब्ध को ही दुःख का कारण मानता है और कोई कर्म को ही दुःख का निमित्त समझता है। कतिपय विद्वान स्वभाव को और कतिपय ईश्वर को भी दुःख का कारण मानते हैं। अतः हे राजन्! अब आप ही निश्चित कीजिये कि दुःख का कारण कौन है।"
सम्राट परीक्षित उस बैल के वचनों को सुन कर बोले - "हे वृषभ! आप अवश्य ही बैल के रूप में धर्म हैं और यह गौरूपिणी पृथ्वी माता है। आप धर्म के मर्म को भली-भाँति जानते हैं। आप किसी की चुगली नहीं कर सकते इसीलिये आप दुःख देने वाले का नाम नहीं बता रहे हैं। हे धर्म! सतयुग में आपके तप, पवित्रता, दया और सत्य चार चरण थे। त्रेता में तीन चरण रह गये, द्वापर में दो ही रह गये और अब इस दुष्ट कलियुग के कारण आपका एक ही चरण रह गया है। यह अधर्मरूपी कलियुग अपने असत्य से उस चरण को भी नष्ट करने का प्रयत्न कर रहा है। भगवान श्रीकृष्णचन्द्र के स्वधाम गमन से दुष्ट पापी शूद्र राजा लोग इस गौरूपिणी पृथ्वी को भोगेंगे इसी कारण से यह माता भी दुःखी हैं।"
इतना कह कर राजा परीक्षीत ने उस पापी शूद्र राजवेषधारी कलियुग को मारने के लिये अपनी तीक्ष्ण धार वाली तलवार निकाली। कलियुग ने भयभीत होकर अपने राजसी वेष को उतार कर राजा परीक्षित के चरणों में गिर गया और त्राहि-त्राहि कहने लगा। राजा परीक्षित बड़े शरणागत वत्सल थे, उनहोंने शरण में आये हुये कलियुग को मारना उचित न समझा और कलियुग से कहा - "हे कलियुग! तू मेरे शरण में आ गया है इसलिये मैंने तुझे प्राणदान दिया। किन्तु अधर्म, पाप, झूठ, चोरी, कपट, दरिद्रता आदि अनेक उपद्रवों का मूल कारण केवल तू ही है। अतः तू मेरे राज्य से तुरन्त निकल जा और लौट कर फिर कभी मत आना।"
राजा परीक्षित के इन वचनों को सुन कर कलियुग ने कातर वाणी में कहा - "हे राजन्! आपका राज्य तो सम्पूर्ण पृथ्वी पर है, आपके राज्य से बाहर ऐसा कोई भी स्थान नहीं है जहाँ पर कि मैं निवास कर सकूँ। हे भूपति! आप बड़े दयालु हैं, आपने मुझे शरण दिया है। अब दया करके मेरे निवास का भी कुछ न कुछ प्रबन्ध आपको करना ही होगा।"
कलियुग इस तरह कहने पर राजा परीक्षित सोच में पड़ गये। फिर विचार कर के उन्होंने कहा - "हे कलियुग! द्यूत, मद्यपान, परस्त्रीगमन और हिंसा इन चार स्थानों में असत्य, मद, काम और क्रोध का निवास होता है। इन चार स्थानों में निवास करने की मैं तुझे छूट देता हूँ।" इस पर कलियुग बोला - "हे उत्तरानन्दन! ये चार स्थान मेरे निवास के लिये अपर्याप्त हैं। दया करके कोई और भी स्थान मुझे दीजिये।" कलियुग के इस प्रकार माँगने पर राजा परीक्षित ने उसे पाँचवा स्थान 'स्वर्ण' दिया।
कलियुग इन स्थानों के मिल जाने से प्रत्यक्षतः तो वहाँ से चला गया किन्तु कुछ दूर जाने के बाद अदृष्य रूप में वापस आकर राजा परीक्षित के स्वर्ण मुकुट में निवास करने लगा।
Tuesday, January 4, 2011
साल के पहले सूर्यग्रहण का राशियों पर प्रभाव
मेष : सूर्ग्रहण का असर दिखेगा लेकिन प्रभावी नहीं होगा, असर के कारण परेशानियां तो होंगी लेकिन लंबे समय तक रहेंगी, दैनिक जीवन के कार्यों में बाधाएं आएगी लेकिन खर्चा बढ़ेगा लेकिन सभी कार्य पूरे हो जायेंगे।
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वृष: शुक्र के राशि परिवर्तन से वृषभ राशि वालों के सोचे हुए सभी कार्य पूरे होंगे। वृषभ राशि के जातकों को अपने जीवनसाथी से सहयोग मिलता रहेगा। पार्टनरशीप करने वालों के कार्य बनेंगे।
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मिथुन: शुक्र का राशि परिर्वतन करना मिथुन राशि वालों के लिए खर्चा बढ़ाएगा। शत्रूओं से निपटने के लिए खर्चा होगा और ज्यादातर खर्चा दिखावे पर होगा लेकिन मानसिक परेशानियों के बाद सफलता मिलेगी।
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कर्क : शुक्र, कर्क राशि वालों के लिए विद्या और बुद्धि से संबंधित कार्यों में सफलता दिलाएगा। यह समय विद्यार्थियों के लिए अच्छा रहेगा। प्रतियोगी परिक्षाओं में सफलता मिलेगी। जो अविवाहित हैं वो विवाहित हो जायेंगे।
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सिंह: सिंह राशि वालों को वाहनों से सावधान रहना चाहिए। भूमि, मकान और स्थाई सम्पत्ती से संबंधित परेशानियां होगी और खर्चा भी बढ़ेगा। लेकिन ये सूर्ग्रहण उनके लिए लाभदायक ही है, सिंह के लिये ये प्रगति ही ले कर आयेगा।
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कन्या : कन्या राशि वालों के लिए यह समय आर्थिक तंगी वाला रहेगा लेकिन इनको प्रेम प्रसंग में सफलता मिलेगी। जीवनसाथी से प्रेम बढ़ेगा। मांगलिक कार्योँ पर खर्चा बढ़ेगा।
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तुला : तुला राशिवालों का राशि स्वामी ही शुक्र है इसलिए इनके धन में वृद्धि होगी, अच्छे निवेश के योग बनेंगे। कष्ट में कमी आएगी और सुख में वृद्धि होगी।
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वृश्चिक: वृश्चिक राशि में ही शुक्र का प्रवेश होने से इस राशि वालों का झुकाव वृषभ राशि वालों की और बढ़ेगा। वृश्चिक और वृषभ राशि राशि के प्रेमियों के संबंध और अधिक मधुर बनेंगे।
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धनु: शुक्र के वृश्चिक राशि में आ जाने से धनु राशि वालों के लिए खर्चा बढ़ेगा। स्थाई सम्पत्ती यानी भूमि एवं मकान पर खर्च होगा। यात्रा के योग बनेंगे और यात्राओं पर खर्च भी होगा।
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मकर: मकर राशि वालों के लिए शुक्र का वृश्चिक राशि में प्रवेश करना बहुत अच्छा रहेगा। भाई बंधुओं से सहयोग मिलेगा। आर्थिक लाभ मिलेगा। बुद्धि और योजनाओं से सुख और लाभ मिलेगा।
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कुंभ : भूमि और स्थायी संपत्ती से लाभ मिलेगा। जब तक शुक्र वृश्चिक राशि में रहेगा तब तक आपके सभी निर्णय सही होंगे। बेरोजगारों को रोजगार के अवसर मिलेंगे।
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मीन: मीन राशि वालों को सम्मान यश और प्रतिष्ठा मिलेगी। धार्मिक और मांगलिक कार्यों में खर्चा होगा। लेकिन भाग्य की मेहरबानी के आगे जितना खर्चा होगा उससे कहीं ज्यादा लाभ की संभावना है।
Monday, January 3, 2011
मनुष्य जीवन का रहस्य
भगवान श्री कृष्ण कहते हैं....
मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम् ।
सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥ (गीता १४/३)
मेरी यह आठ तत्वों वाली जड़ प्रकृति (जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार) ही समस्त वस्तुओं को उत्पन्न करने वाली माता है और मैं ही ब्रह्म रूप में चेतन-रूपी बीज को स्थापित करता हूँ, इस जड़-चेतन के संयोग से ही सभी चर-अचर प्राणीयों का जन्म सम्भव होता है।
संसार यानि प्रकृति आठ जड़ तत्वों (पाँच स्थूल तत्व और तीन दिव्य तत्व) से मिलकर बना है।
स्थूल तत्व = जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी और आकाश।
दिव्य तत्व = बुद्धि, मन और अहंकार।
हमारे स्वयं के दो रूप होते हैं एक बाहरी दिखावटी रूप जिसे स्थूल शरीर कहते हैं और दूसरा आन्तरिक वास्तविक दिव्य रूप जिसे जीव कहते हैं। बाहरी शरीर रूप स्थूल तत्वों के द्वारा निर्मित होता है और हमारा आन्तरिक जीव रूप दिव्य तत्वों के द्वारा निर्मित होता है।
सबसे पहले हमें बुद्धि तत्व के द्वारा अहंकार तत्व को जानना होता है, (अहंकार = अहं + आकार = स्वयं का रूप) स्वयं के रूप को ही अहंकार कहते हैं। शरीर को अपना वास्तविक रूप समझना मिथ्या अहंकार कहलाता है और जीव रूप को अपना समझना शाश्वत अहंकार कहलाता है।
जब तक मनुष्य बुद्धि के द्वारा अपनी पहिचान स्थूल शरीर रूप में करता रहता है तो वह मिथ्या अहंकार (अवास्तविक स्वरूप) से ग्रसित रहता है तब तक सभी मनुष्य अज्ञान में ही रहते है। इस प्रकार अज्ञान से आवृत होने के कारण तब तक सभी जीव अचेत अवस्था (बेहोशी की हालत) में ही रहते हैं उन्हे मालूम ही नही होता है कि वह क्या कर रहें हैं और उन्हे क्या करना चाहिये।
जब कोई मनुष्य भगवान की कृपा से निरन्तर किसी तत्वदर्शी संत के सम्पर्क में रहता है तो वह मनुष्य सचेत अवस्था (होश की हालत) में आने लगता है, तब वह अपनी पहिचान जीव रूप से करने लगता है तब उसका मिथ्या अहंकार मिटने लगता है और शाश्वत अहंकार (वास्तविक स्वरूप) में परिवर्तित होने लगता है यहीं से उसका अज्ञान दूर होने लगता है।
इसका अर्थ है कि हमारे दोनों स्वरूप ज़ड़ ही हैं। जब पूर्ण चेतन स्वरूप परमात्मा का आंशिक चेतन अंश आत्मा जब जीव से संयुक्त होता है तो दोनों रूपों में चेतनता आ जाती है जिससे ज़ड़ प्रकृति भी चेतन हो जाती है इस प्रकार ज़ड़ और चेतन का संयोग ही सृष्टि कहलाती है।
भगवान की यह दो प्रमुख शक्तियाँ एक ज़ड़ शक्ति जिसमें जीव भी शामिल है "अपरा शक्ति" कहते हैं, दूसरी चेतन शक्ति यानि आत्मा "परा शक्ति" कहते हैं। यही अपरा और परा शक्ति के संयोग से ही सम्पूर्ण सृष्टि का संचालन सुचारु रूप से चलता रहता है।
श्री कृष्ण ही केवल एक मात्र पूर्ण चेतन स्वरूप भगवान हैं वह साकार रूप मैं पूर्ण पुरुषोत्तम हैं, सभी ज़ड़ और चेतन रूप में दिखाई देने वाली और न दिखाई देने वाली सभी वस्तुयें भगवान श्री कृष्ण का अंश मात्र ही हैं। स्थूल तत्व रूप से साकार रूप में दिखाई देते हैं और दिव्य तत्व रूप से निराकार रूप में कण-कण में व्याप्त हैं।
भगवान तो स्वयं में परिपूर्ण हैं......
पूर्ण मदः, पूर्ण मिदं, पूर्णात, पूर्ण मुदचत्ये।
पूर्णस्य, पूर्ण मादाये, पूर्ण मेवावशिश्यते॥
जो परिपूर्ण परमेश्वर है, वही पूर्ण ईश्वर है, वही पूर्ण जगत है, ईश्वर की पूर्णता से पूर्ण जगत सम्पूर्ण है। ईश्वर की पूर्णता से पूर्ण ही निकलता है और पूर्ण ही शेष बचता है। यही परिपूर्ण परमेश्वर की यह पूर्णता ही पूर्ण विशेषता है।
संसार में कुछ भी नष्ट नहीं होता है, न तो स्थूल तत्व ही नष्ट होते हैं और न ही दिव्य तत्व नष्ट होते हैं, स्थूल तत्वों के मिश्रण से पदार्थ की उत्पत्ति होती है, पदार्थ ही नष्ट होते हुए दिखाई देते हैं, जबकि स्थूल तत्व नष्ट नहीं होते हैं इन तत्वों की पुनरावृत्ति होती है परन्तु जो चेतन तत्व आत्मा है वह हमेशा एक सा ही बना रहता है उसमें किसी भी प्रकार का परिवर्तन नहीं होता है।
जीव स्वयं में अपूर्ण है जव जीव आत्मा से संयुक्त होता है तब यह जीवात्मा कहलाता है। इससे सिद्ध होता है जीव ज़ड़ ही है और आत्मा जो कि भगवान का अंश कहलाता है अंश कभी भी अपने अंशी से अलग होकर भी कभी अलग नहीं होता है, इसलिये जो आत्मा कहलाता है वह वास्तव में परमात्मा ही है।
*** उदाहरण के लिये ***
जिस प्रकार कोई भी शक्तिशाली मनुष्य अपनी शक्ति के कारण ही शक्तिमान बनता है, शक्ति कभी शक्तिमान से अलग नहीं हो सकती है उसी प्रकार भगवान शक्तिशाली हैं, और "अपरा और परा" भगवान की प्रमुख शक्तियाँ हैं इसलिये जीव भगवान से अलग नहीं है।
इस प्रकार जीव स्वयं भी अपना नहीं है तो स्थूल तत्वों से निर्मित कोई भी वस्तु हमारी कैसे हो सकती है जब इन वस्तुओं को हम अपना समझते हैं तो इसे "मोह" कहते हैं, मिथ्या अहंकार के कारण हम स्वयं की पहिचान स्थूल शरीर के रूप में करने लगते है और मोह के कारण शरीर से सम्बन्धित सभी वस्तुओं को अपना समझने लगते हैं।
तब फिर प्रश्न उठता है कि संसार में अपना क्या है?
जीव का जीवन आत्मा और शरीर इन दो वस्तुओं के संयोग से चलता है, यह दोनों वस्तु जीव को ऋण के रूप में प्राप्त होती है, जीव को भगवान ने बुद्धि और मन दिये हैं। बुद्धि के अन्दर "विवेक" होता है और मन के अन्दर "भाव" की उत्पत्ति होती है। जब बुद्धि के द्वारा जानकर, मन में जो भाव उत्पन्न होता है उसे ही "स्वभाव = स्व+भाव" कहते हैं, यही भाव ही व्यक्ति का अपना होता है। इस स्वभाव के अनुसार ही कर्म होता है।
आत्मा परमात्मा का ऋण है और शरीर प्रकृति का ऋण है, इन दोनों ऋण से मुक्त होना ही मुक्ति कहलाती है, इन ऋण से मुक्त होने की "श्रीमद भगवत गीता" के अनुसार केवल दो विधियाँ हैं।
पहली विधि तो यह है कि बुद्धि-विवेक के द्वारा आत्मा और शरीर अलग-अलग अनुभव करके, जीवन के हर क्षण में "भाव" के द्वारा आत्मा को भगवान को सुपुर्द करना होता है और शरीर को प्रकृति को सुपुर्द करना होता है, इस विधि को "श्रीमद भगवत गीता" के अनुसार "सांख्य-योग" कहा गया है।
दूसरी विधि यह है कि बुद्धि-विवेक के द्वारा अपने कर्तव्य कर्म को "निष्काम भाव" से करते हुए कर्म-फलों को भगवान के सुपुर्द कर दिया जाता है, इस विधि को "श्रीमद भगवत गीता" के अनुसार "निष्काम कर्म-योग" या "भक्ति-योग कहा गया है और इसी को "समर्पण-योग" भी कहते हैं।
जिस व्यक्ति को "सांख्य-योग" अच्छा लगता है वह पहली विधि को अपनाता है, और जिस व्यक्ति को "भक्ति-योग" अच्छा लगता है वह दूसरी विधि को अपनाता है। जो व्यक्ति इन दोनों विधियों के अतिरिक्त बुद्धि के द्वारा जो भी कुछ करता है, वह व्यक्ति ऋण से मुक्त नहीं हो पाता है, इन ऋण को चुकाने के लिये ही उसे बार-बार जन्म लेना पड़ता है।
इन सभी अवस्था में कर्म तो करना ही पड़ता है और मनुष्य कर्म करने मे सदैव स्वतंत्र होता है, भगवान किसी के भी कर्म में हस्तक्षेप नहीं करते हैं, क्योंकि किसी के भी कर्म में हस्तक्षेप करने का विधि का विधान नहीं है।
इसलिये मनुष्य को न तो किसी कर्म में हस्तक्षेप करना चाहिये और न ही किसी के हस्तक्षेप करने से विचलित होना चाहिये, इस प्रकार अपनी स्थिति पर दृड़ रहने का अभ्यास करना चाहिये।
जब कोई व्यक्ति अपने आध्यात्मिक उत्थान की इच्छा करता है, तब बुद्धि के द्वारा सत्य को जानकर सत्संग करने लगता है तो उस व्यक्ति का विवेक जाग्रत होता है, तब उसके मन में उस सत्य को ही पाने की लालसा उत्पन्न होती है।
जब यह लालसा अपनी चरम सीमा पर पहुँचती है तब मन में शुद्ध-भाव की उत्पत्ति होती है, तब उस व्यक्ति को सर्वज्ञ सत्य की अनुभूति होती है, यह शुद्ध-भाव मक्खन के समान अति कोमल, अति निर्मल होता है।
बस यही मक्खन परम-सत्य स्वरूप भगवान श्रीकृष्ण को प्रिय है, इस शुद्ध-भाव रूपी मक्खन को चुराने के लिये भगवान स्वयं आते हैं।
यही "कर्म-योग" का सम्पूर्ण सार है। यही मनुष्य जीवन का सार है। यही मनुष्य जीवन का एकमात्र उद्देश्य है। यही मनुष्य जीवन की अन्तिम उपलब्धि है। यही मनुष्य जीवन की परम-सिद्धि है। इसे प्राप्त करके कुछ भी पाना शेष नहीं रहता है। यह उपलब्धि केवल मनुष्य जीवन ही प्राप्त होती है।
॥ हरि ॐ तत सत ॥
श्री हरि विष्णु का कल्की अवतार कलयुग के अंत में होगा
हमारे धर्म ग्रंथों में उल्लेख है कि कलयुग के अंत में भगवान विष्णु अवतरित होंगे तथा संसार को अधर्मियों से मुक्ति दिलाएंगे। महाभारत के वनपर्व में इस संदर्भ में विस्तृत उल्लेख आया है।
उसके अनुसार कलयुग के अंत में जब सत्य की हानि होने के कारण मनुष्यों की आयु थोड़ी हो जाएगी। (उस समय मनुष्य की आयु अधिक से अधिक सोलह वर्ष की होगी।) आयु की कमी के कारण मनुष्य पूर्ण विद्या का उपार्जन नहीं कर सकेंगे। सभी जातियाँ आपस में संतानोत्पादन कर वर्ण संकर हो जाएंगे, इनका विभाग करना कठिन हो जाएगा। गायों का दर्शन दुर्लभ हो जाएगा। कलियुग में वर-कन्या अपने -आप का स्वयंवर कर लेंगे। कोई भगवान का नाम नहीं लेगा। तप,यज्ञ, पूजन आदि बंद हो जाएंगे। ब्राह्मण व्रत-नियमों का पालन नहीं करेंगे। जब चहुंओर असत्य और अधर्म का साम्राज्य होगा। अधिकांश मनुष्य धर्महीन, मांसभोजी और शराब पीने वाले होंगे। उसी समय इस युग का अंत निकट होगा।
तब शम्भल नामक ग्राम में विष्णुयशा नाम के ब्राह्मण के घर में एक बालक का जन्म होगा। उसका नाम होगा कल्की विष्णुयशा। यह बालक बहुत ही बलवान, बुद्धिमान और पराक्रमी होगा। मन के द्वारा चिंतन करते ही उसके पास इच्छानुसार वाहन, अस्त्र-शस्त्र, योद्धा और कवच उपस्थित हो जाएँगे। वह ब्राह्मणों की सेना साथ लेकर संसार में सर्वत्र फैले हुए मलेच्छों का नाश कर डालेगा। वही सब दुष्टों का नाश करके सतयुग का प्रवर्तक होगा। यह ही भगवान की विष्णु का कल्की अवतार होगा।
उसके अनुसार कलयुग के अंत में जब सत्य की हानि होने के कारण मनुष्यों की आयु थोड़ी हो जाएगी। (उस समय मनुष्य की आयु अधिक से अधिक सोलह वर्ष की होगी।) आयु की कमी के कारण मनुष्य पूर्ण विद्या का उपार्जन नहीं कर सकेंगे। सभी जातियाँ आपस में संतानोत्पादन कर वर्ण संकर हो जाएंगे, इनका विभाग करना कठिन हो जाएगा। गायों का दर्शन दुर्लभ हो जाएगा। कलियुग में वर-कन्या अपने -आप का स्वयंवर कर लेंगे। कोई भगवान का नाम नहीं लेगा। तप,यज्ञ, पूजन आदि बंद हो जाएंगे। ब्राह्मण व्रत-नियमों का पालन नहीं करेंगे। जब चहुंओर असत्य और अधर्म का साम्राज्य होगा। अधिकांश मनुष्य धर्महीन, मांसभोजी और शराब पीने वाले होंगे। उसी समय इस युग का अंत निकट होगा।
तब शम्भल नामक ग्राम में विष्णुयशा नाम के ब्राह्मण के घर में एक बालक का जन्म होगा। उसका नाम होगा कल्की विष्णुयशा। यह बालक बहुत ही बलवान, बुद्धिमान और पराक्रमी होगा। मन के द्वारा चिंतन करते ही उसके पास इच्छानुसार वाहन, अस्त्र-शस्त्र, योद्धा और कवच उपस्थित हो जाएँगे। वह ब्राह्मणों की सेना साथ लेकर संसार में सर्वत्र फैले हुए मलेच्छों का नाश कर डालेगा। वही सब दुष्टों का नाश करके सतयुग का प्रवर्तक होगा। यह ही भगवान की विष्णु का कल्की अवतार होगा।
Friday, December 31, 2010
शुभ कामनाएं
सर्वस्तरतु दुर्गाणि सर्वो भद्राणि पश्यतु।
सर्वः कामानवाप्नोतु सर्वः सर्वत्र नन्दतु॥
सब लोग कठिनाइयों को पार करें। सब लोग कल्याण को देखें। सब लोग अपनी इच्छित वस्तुओं को प्राप्त करें। सब लोग सर्वत्र आनन्दित हों
और ...
सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥
सभी सुखी हों। सब नीरोग हों। सब मंगलों का दर्शन करें। कोई भी दुखी न हो।
सर्वः कामानवाप्नोतु सर्वः सर्वत्र नन्दतु॥
सब लोग कठिनाइयों को पार करें। सब लोग कल्याण को देखें। सब लोग अपनी इच्छित वस्तुओं को प्राप्त करें। सब लोग सर्वत्र आनन्दित हों
और ...
सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥
सभी सुखी हों। सब नीरोग हों। सब मंगलों का दर्शन करें। कोई भी दुखी न हो।
Monday, December 27, 2010
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