Wednesday, January 5, 2011

श्री विष्णु सहस्त्रनाम ( सम्पूर्ण )

कलियुग का आगमन



धर्मराज युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेव पाँचों पाण्डव महापराक्रमी परीक्षित को राज्य देकर महाप्रयाण हेतु उत्तराखंड की ओर चले गये और वहाँ जाकर पुण्यलोक को प्राप्त हुये। राजा परीक्षित धर्म के अनुसार तथा ब्राह्नणों की आज्ञानुसार शासन करने लगे। उत्तर नरेश की पुत्री इरावती के साथ उन्होंने अपना विवाह किया और उस उत्तम पत्नी से उनके चार पुत्र उत्पन्न हुये। आचार्य कृप को गुरु बना कर उन्होंने जाह्नवी के तट पर तीन अश्वमेघ यज्ञ किये। उन यज्ञों में अनन्त धन राशि ब्रह्मणों को दान में दी और दिग्विजय हेतु निकल गये।
उन्हीं दिनों धर्म ने बैल का रूप बना कर गौरूपिणी पृथ्वी से सरस्वती तट पर भेंट किया। गौरूपिणी पृथ्वी की नेत्रों से अश्रु बह रहे थे और वह श्रीहीन सी प्रतीत हो रही थी। धर्म ने पृथ्वी से पूछा - "हे देवि! तुम्हारा मुख मलिन क्यों हो रहा है? किस बात की तुम्हें चिन्ता है? कहीं तुम मेरी चिन्ता तो नहीं कर रही हो कि अब मेरा केवल एक पैर ही रह गया है या फिर तुम्हें इस बात की चिन्ता है कि अब तुम पर शूद्र राज्य करेंगे?"
पृथ्वी बोली - "हे धर्म! तुम सर्वज्ञ होकर भी मुझ से मेरे दुःख का कारण पूछते हो! सत्य, पवित्रता, क्षमा, दया, सन्तोष, त्याग, शम, दम, तप, सरलता, क्षमता, शास्त्र विचार, उपरति, तितिक्षा, ज्ञान, वैराग्य, शौर्य, तेज, ऐश्वर्य, बल, स्मृति, कान्ति, कौशल, स्वतन्त्रता, निर्भीकता, कोमलता, धैर्य, साहस, शील, विनय, सौभाग्य, उत्साह, गम्भीरता, कीर्ति, आस्तिकता, स्थिरता, गौरव, अहंकारहीनता आदि गुणों से युक्त भगवान श्रीकृष्ण के स्वधाम गमन के कारण घोर कलियुग मेरे ऊपर आ गया है। मुझे तुम्हारे साथ ही साथ देव, पितृगण, ऋषि, साधु, सन्यासी आदि सभी के लिये महान शोक है। भगवान श्रीकृष्ण के जिन चरणों की सेवा लक्ष्मी जी करती हैं उनमें कमल, वज्र, अंकुश, ध्वजा आदि के चिह्न विराजमान हैं और वे ही चरण मुझ पर पड़ते थे जिससे मैं सौभाग्यवती थी। अब मेरा सौभाग्य समाप्त हो गया है।"
जब धर्म और पृथ्वी ये बातें कर ही रहे थे कि मुकुटधारी शूद्र के रूप में कलियुग वहाँ आया और उन दोनों को मारने लगा।
अरे दुष्ट कलिकाल तू, देता दुःख महान।
पाण्डु पौत्र मारन चले, ले करमें धनुवान॥
राजा परीक्षित दिग्विजय करते हुये वहीं पर से गुजर रहे थे। उन्होंने मुकुटधारी शूद्र को हाथ में डण्डा लिये एक गाय और एक बैल को बुरी तरह पीटते देखा। वह बैल अत्यन्त सुन्दर था, उसका श्वेत रंग था और केवल एक पैर था। गाय भी कामधेनु के समान सुन्दर थी। दोनों ही भयभीत हो कर काँप रहे थे। महाराज परीक्षित अपने धनुषवाण को चढ़ाकर मेघ के समान गम्भीर वाणी में ललकारे - "रे दुष्ट! पापी! नराधम! तू कौन है? इन निरीह गाय तथा बैल क्यों सता रहा है? तू महान अपराधी है। तेरे अपराध का उचित दण्ड तेरा वध ही है।" उनके इन वचनों को सुन कर कलियुग भय से काँपने लगा।
महाराज ने बैल से पूछा कि हे बैल तुम्हारे तीन पैर कैस टूटे गये हैं। तुम बैल हो या कोई देवता हो। हे धेनुपुत्र! तुम निर्भीकतापूर्वक अपना अपना वृतान्त मुझे बताओ। हे गौमाता! अब तुम भयमुक्त हो जाओ। मैं दुष्टों को दण्ड देता हूँ। किस दुष्ट ने मेरे राज्य में घोर पाप कर के पाण्डवों की पवित्र कीर्ति में यह कलंक लगाया है? चाहे वह पापी साक्षात् देवता ही क्यों न हो मैं उसके भी हाथ काट दूँगा। तब धर्म बोला - "हे महाराज! आपने भगवान श्रीकृष्ण के परमभक्त पाण्डवों के कुल में जन्म लिया है अतः ये वचन आप ही के योग्य हैं। हे राजन्! हम यह नहीं जानते कि संसार के जीवों को कौन क्लेश देता है। शास्त्रों में भी इसका निरूपण अनेक प्रकार से किया गया है। जो द्वैत को नहीं मानता वह दुःख का कारण अपने आप को ही स्वीकार करता हैं। कोई प्रारब्ध को ही दुःख का कारण मानता है और कोई कर्म को ही दुःख का निमित्त समझता है। कतिपय विद्वान स्वभाव को और कतिपय ईश्वर को भी दुःख का कारण मानते हैं। अतः हे राजन्! अब आप ही निश्चित कीजिये कि दुःख का कारण कौन है।"
सम्राट परीक्षित उस बैल के वचनों को सुन कर बोले - "हे वृषभ! आप अवश्य ही बैल के रूप में धर्म हैं और यह गौरूपिणी पृथ्वी माता है। आप धर्म के मर्म को भली-भाँति जानते हैं। आप किसी की चुगली नहीं कर सकते इसीलिये आप दुःख देने वाले का नाम नहीं बता रहे हैं। हे धर्म! सतयुग में आपके तप, पवित्रता, दया और सत्य चार चरण थे। त्रेता में तीन चरण रह गये, द्वापर में दो ही रह गये और अब इस दुष्ट कलियुग के कारण आपका एक ही चरण रह गया है। यह अधर्मरूपी कलियुग अपने असत्य से उस चरण को भी नष्ट करने का प्रयत्न कर रहा है। भगवान श्रीकृष्णचन्द्र के स्वधाम गमन से दुष्ट पापी शूद्र राजा लोग इस गौरूपिणी पृथ्वी को भोगेंगे इसी कारण से यह माता भी दुःखी हैं।"
इतना कह कर राजा परीक्षीत ने उस पापी शूद्र राजवेषधारी कलियुग को मारने के लिये अपनी तीक्ष्ण धार वाली तलवार निकाली। कलियुग ने भयभीत होकर अपने राजसी वेष को उतार कर राजा परीक्षित के चरणों में गिर गया और त्राहि-त्राहि कहने लगा। राजा परीक्षित बड़े शरणागत वत्सल थे, उनहोंने शरण में आये हुये कलियुग को मारना उचित न समझा और कलियुग से कहा - "हे कलियुग! तू मेरे शरण में आ गया है इसलिये मैंने तुझे प्राणदान दिया। किन्तु अधर्म, पाप, झूठ, चोरी, कपट, दरिद्रता आदि अनेक उपद्रवों का मूल कारण केवल तू ही है। अतः तू मेरे राज्य से तुरन्त निकल जा और लौट कर फिर कभी मत आना।"
राजा परीक्षित के इन वचनों को सुन कर कलियुग ने कातर वाणी में कहा - "हे राजन्! आपका राज्य तो सम्पूर्ण पृथ्वी पर है, आपके राज्य से बाहर ऐसा कोई भी स्थान नहीं है जहाँ पर कि मैं निवास कर सकूँ। हे भूपति! आप बड़े दयालु हैं, आपने मुझे शरण दिया है। अब दया करके मेरे निवास का भी कुछ न कुछ प्रबन्ध आपको करना ही होगा।"
कलियुग इस तरह कहने पर राजा परीक्षित सोच में पड़ गये। फिर विचार कर के उन्होंने कहा - "हे कलियुग! द्यूत, मद्यपान, परस्त्रीगमन और हिंसा इन चार स्थानों में असत्य, मद, काम और क्रोध का निवास होता है। इन चार स्थानों में निवास करने की मैं तुझे छूट देता हूँ।" इस पर कलियुग बोला - "हे उत्तरानन्दन! ये चार स्थान मेरे निवास के लिये अपर्याप्त हैं। दया करके कोई और भी स्थान मुझे दीजिये।" कलियुग के इस प्रकार माँगने पर राजा परीक्षित ने उसे पाँचवा स्थान 'स्वर्ण' दिया।
कलियुग इन स्थानों के मिल जाने से प्रत्यक्षतः तो वहाँ से चला गया किन्तु कुछ दूर जाने के बाद अदृष्य रूप में वापस आकर राजा परीक्षित के स्वर्ण मुकुट में निवास करने लगा।

Tuesday, January 4, 2011

साल के पहले सूर्यग्रहण का राशियों पर प्रभाव



मेष : सूर्ग्रहण का असर दिखेगा लेकिन प्रभावी नहीं होगा, असर के कारण परेशानियां तो होंगी लेकिन लंबे समय तक रहेंगी, दैनिक जीवन के कार्यों में बाधाएं आएगी लेकिन खर्चा बढ़ेगा लेकिन सभी कार्य पूरे हो जायेंगे।
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वृष: शुक्र के राशि परिवर्तन से वृषभ राशि वालों के सोचे हुए सभी कार्य पूरे होंगे। वृषभ राशि के जातकों को अपने जीवनसाथी से सहयोग मिलता रहेगा। पार्टनरशीप करने वालों के कार्य बनेंगे।
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मिथुन: शुक्र का राशि परिर्वतन करना मिथुन राशि वालों के लिए खर्चा बढ़ाएगा। शत्रूओं से निपटने के लिए खर्चा होगा और ज्यादातर खर्चा दिखावे पर होगा लेकिन मानसिक परेशानियों के बाद सफलता मिलेगी।
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कर्क : शुक्र, कर्क राशि वालों के लिए विद्या और बुद्धि से संबंधित कार्यों में सफलता दिलाएगा। यह समय विद्यार्थियों के लिए अच्छा रहेगा। प्रतियोगी परिक्षाओं में सफलता मिलेगी। जो अविवाहित हैं वो विवाहित हो जायेंगे।
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सिंह: सिंह राशि वालों को वाहनों से सावधान रहना चाहिए। भूमि, मकान और स्थाई सम्पत्ती से संबंधित परेशानियां होगी और खर्चा भी बढ़ेगा। लेकिन ये सूर्ग्रहण उनके लिए लाभदायक ही है, सिंह के लिये ये प्रगति ही ले कर आयेगा।
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कन्या : कन्या राशि वालों के लिए यह समय आर्थिक तंगी वाला रहेगा लेकिन इनको प्रेम प्रसंग में सफलता मिलेगी। जीवनसाथी से प्रेम बढ़ेगा। मांगलिक कार्योँ पर खर्चा बढ़ेगा।
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तुला : तुला राशिवालों का राशि स्वामी ही शुक्र है इसलिए इनके धन में वृद्धि होगी, अच्छे निवेश के योग बनेंगे। कष्ट में कमी आएगी और सुख में वृद्धि होगी।
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वृश्चिक: वृश्चिक राशि में ही शुक्र का प्रवेश होने से इस राशि वालों का झुकाव वृषभ राशि वालों की और बढ़ेगा। वृश्चिक और वृषभ राशि राशि के प्रेमियों के संबंध और अधिक मधुर बनेंगे।
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धनु: शुक्र के वृश्चिक राशि में आ जाने से धनु राशि वालों के लिए खर्चा बढ़ेगा। स्थाई सम्पत्ती यानी भूमि एवं मकान पर खर्च होगा। यात्रा के योग बनेंगे और यात्राओं पर खर्च भी होगा।
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मकर: मकर राशि वालों के लिए शुक्र का वृश्चिक राशि में प्रवेश करना बहुत अच्छा रहेगा। भाई बंधुओं से सहयोग मिलेगा। आर्थिक लाभ मिलेगा। बुद्धि और योजनाओं से सुख और लाभ मिलेगा।
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कुंभ : भूमि और स्थायी संपत्ती से लाभ मिलेगा। जब तक शुक्र वृश्चिक राशि में रहेगा तब तक आपके सभी निर्णय सही होंगे। बेरोजगारों को रोजगार के अवसर मिलेंगे।
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मीन: मीन राशि वालों को सम्मान यश और प्रतिष्ठा मिलेगी। धार्मिक और मांगलिक कार्यों में खर्चा होगा। लेकिन भाग्य की मेहरबानी के आगे जितना खर्चा होगा उससे कहीं ज्यादा लाभ की संभावना है।

Monday, January 3, 2011

मनुष्य जीवन का रहस्य



भगवान श्री कृष्ण कहते हैं....

मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम्‌ ।
सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥ (गीता १४/३)

मेरी यह आठ तत्वों वाली जड़ प्रकृति (जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार) ही समस्त वस्तुओं को उत्पन्न करने वाली माता है और मैं ही ब्रह्म रूप में चेतन-रूपी बीज को स्थापित करता हूँ, इस जड़-चेतन के संयोग से ही सभी चर-अचर प्राणीयों का जन्म सम्भव होता है।

संसार यानि प्रकृति आठ जड़ तत्वों (पाँच स्थूल तत्व और तीन दिव्य तत्व) से मिलकर बना है।

स्थूल तत्व = जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी और आकाश।
दिव्य तत्व = बुद्धि, मन और अहंकार।

हमारे स्वयं के दो रूप होते हैं एक बाहरी दिखावटी रूप जिसे स्थूल शरीर कहते हैं और दूसरा आन्तरिक वास्तविक दिव्य रूप जिसे जीव कहते हैं। बाहरी शरीर रूप स्थूल तत्वों के द्वारा निर्मित होता है और हमारा आन्तरिक जीव रूप दिव्य तत्वों के द्वारा निर्मित होता है।

सबसे पहले हमें बुद्धि तत्व के द्वारा अहंकार तत्व को जानना होता है, (अहंकार = अहं + आकार = स्वयं का रूप) स्वयं के रूप को ही अहंकार कहते हैं। शरीर को अपना वास्तविक रूप समझना मिथ्या अहंकार कहलाता है और जीव रूप को अपना समझना शाश्वत अहंकार कहलाता है।

जब तक मनुष्य बुद्धि के द्वारा अपनी पहिचान स्थूल शरीर रूप में करता रहता है तो वह मिथ्या अहंकार (अवास्तविक स्वरूप) से ग्रसित रहता है तब तक सभी मनुष्य अज्ञान में ही रहते है। इस प्रकार अज्ञान से आवृत होने के कारण तब तक सभी जीव अचेत अवस्था (बेहोशी की हालत) में ही रहते हैं उन्हे मालूम ही नही होता है कि वह क्या कर रहें हैं और उन्हे क्या करना चाहिये।

जब कोई मनुष्य भगवान की कृपा से निरन्तर किसी तत्वदर्शी संत के सम्पर्क में रहता है तो वह मनुष्य सचेत अवस्था (होश की हालत) में आने लगता है, तब वह अपनी पहिचान जीव रूप से करने लगता है तब उसका मिथ्या अहंकार मिटने लगता है और शाश्वत अहंकार (वास्तविक स्वरूप) में परिवर्तित होने लगता है यहीं से उसका अज्ञान दूर होने लगता है।

इसका अर्थ है कि हमारे दोनों स्वरूप ज़ड़ ही हैं। जब पूर्ण चेतन स्वरूप परमात्मा का आंशिक चेतन अंश आत्मा जब जीव से संयुक्त होता है तो दोनों रूपों में चेतनता आ जाती है जिससे ज़ड़ प्रकृति भी चेतन हो जाती है इस प्रकार ज़ड़ और चेतन का संयोग ही सृष्टि कहलाती है।

भगवान की यह दो प्रमुख शक्तियाँ एक ज़ड़ शक्ति जिसमें जीव भी शामिल है "अपरा शक्ति" कहते हैं, दूसरी चेतन शक्ति यानि आत्मा "परा शक्ति" कहते हैं। यही अपरा और परा शक्ति के संयोग से ही सम्पूर्ण सृष्टि का संचालन सुचारु रूप से चलता रहता है।

श्री कृष्ण ही केवल एक मात्र पूर्ण चेतन स्वरूप भगवान हैं वह साकार रूप मैं पूर्ण पुरुषोत्तम हैं, सभी ज़ड़ और चेतन रूप में दिखाई देने वाली और न दिखाई देने वाली सभी वस्तुयें भगवान श्री कृष्ण का अंश मात्र ही हैं। स्थूल तत्व रूप से साकार रूप में दिखाई देते हैं और दिव्य तत्व रूप से निराकार रूप में कण-कण में व्याप्त हैं।

भगवान तो स्वयं में परिपूर्ण हैं......

पूर्ण मदः, पूर्ण मिदं, पूर्णात, पूर्ण मुदचत्ये।
पूर्णस्य, पूर्ण मादाये, पूर्ण मेवावशिश्यते॥

जो परिपूर्ण परमेश्वर है, वही पूर्ण ईश्वर है, वही पूर्ण जगत है, ईश्वर की पूर्णता से पूर्ण जगत सम्पूर्ण है। ईश्वर की पूर्णता से पूर्ण ही निकलता है और पूर्ण ही शेष बचता है। यही परिपूर्ण परमेश्वर की यह पूर्णता ही पूर्ण विशेषता है।

संसार में कुछ भी नष्ट नहीं होता है, न तो स्थूल तत्व ही नष्ट होते हैं और न ही दिव्य तत्व नष्ट होते हैं, स्थूल तत्वों के मिश्रण से पदार्थ की उत्पत्ति होती है, पदार्थ ही नष्ट होते हुए दिखाई देते हैं, जबकि स्थूल तत्व नष्ट नहीं होते हैं इन तत्वों की पुनरावृत्ति होती है परन्तु जो चेतन तत्व आत्मा है वह हमेशा एक सा ही बना रहता है उसमें किसी भी प्रकार का परिवर्तन नहीं होता है।

जीव स्वयं में अपूर्ण है जव जीव आत्मा से संयुक्त होता है तब यह जीवात्मा कहलाता है। इससे सिद्ध होता है जीव ज़ड़ ही है और आत्मा जो कि भगवान का अंश कहलाता है अंश कभी भी अपने अंशी से अलग होकर भी कभी अलग नहीं होता है, इसलिये जो आत्मा कहलाता है वह वास्तव में परमात्मा ही है।
*** उदाहरण के लिये ***
जिस प्रकार कोई भी शक्तिशाली मनुष्य अपनी शक्ति के कारण ही शक्तिमान बनता है, शक्ति कभी शक्तिमान से अलग नहीं हो सकती है उसी प्रकार भगवान शक्तिशाली हैं, और "अपरा और परा" भगवान की प्रमुख शक्तियाँ हैं इसलिये जीव भगवान से अलग नहीं है।

इस प्रकार जीव स्वयं भी अपना नहीं है तो स्थूल तत्वों से निर्मित कोई भी वस्तु हमारी कैसे हो सकती है जब इन वस्तुओं को हम अपना समझते हैं तो इसे "मोह" कहते हैं, मिथ्या अहंकार के कारण हम स्वयं की पहिचान स्थूल शरीर के रूप में करने लगते है और मोह के कारण शरीर से सम्बन्धित सभी वस्तुओं को अपना समझने लगते हैं।

तब फिर प्रश्न उठता है कि संसार में अपना क्या है?

जीव का जीवन आत्मा और शरीर इन दो वस्तुओं के संयोग से चलता है, यह दोनों वस्तु जीव को ऋण के रूप में प्राप्त होती है, जीव को भगवान ने बुद्धि और मन दिये हैं। बुद्धि के अन्दर "विवेक" होता है और मन के अन्दर "भाव" की उत्पत्ति होती है। जब बुद्धि के द्वारा जानकर, मन में जो भाव उत्पन्न होता है उसे ही "स्वभाव = स्व+भाव" कहते हैं, यही भाव ही व्यक्ति का अपना होता है। इस स्वभाव के अनुसार ही कर्म होता है।

आत्मा परमात्मा का ऋण है और शरीर प्रकृति का ऋण है, इन दोनों ऋण से मुक्त होना ही मुक्ति कहलाती है, इन ऋण से मुक्त होने की "श्रीमद भगवत गीता" के अनुसार केवल दो विधियाँ हैं।

पहली विधि तो यह है कि बुद्धि-विवेक के द्वारा आत्मा और शरीर अलग-अलग अनुभव करके, जीवन के हर क्षण में "भाव" के द्वारा आत्मा को भगवान को सुपुर्द करना होता है और शरीर को प्रकृति को सुपुर्द करना होता है, इस विधि को "श्रीमद भगवत गीता" के अनुसार "सांख्य-योग" कहा गया है।

दूसरी विधि यह है कि बुद्धि-विवेक के द्वारा अपने कर्तव्य कर्म को "निष्काम भाव" से करते हुए कर्म-फलों को भगवान के सुपुर्द कर दिया जाता है, इस विधि को "श्रीमद भगवत गीता" के अनुसार "निष्काम कर्म-योग" या "भक्ति-योग कहा गया है और इसी को "समर्पण-योग" भी कहते हैं।

जिस व्यक्ति को "सांख्य-योग" अच्छा लगता है वह पहली विधि को अपनाता है, और जिस व्यक्ति को "भक्ति-योग" अच्छा लगता है वह दूसरी विधि को अपनाता है। जो व्यक्ति इन दोनों विधियों के अतिरिक्त बुद्धि के द्वारा जो भी कुछ करता है, वह व्यक्ति ऋण से मुक्त नहीं हो पाता है, इन ऋण को चुकाने के लिये ही उसे बार-बार जन्म लेना पड़ता है।

इन सभी अवस्था में कर्म तो करना ही पड़ता है और मनुष्य कर्म करने मे सदैव स्वतंत्र होता है, भगवान किसी के भी कर्म में हस्तक्षेप नहीं करते हैं, क्योंकि किसी के भी कर्म में हस्तक्षेप करने का विधि का विधान नहीं है।

इसलिये मनुष्य को न तो किसी कर्म में हस्तक्षेप करना चाहिये और न ही किसी के हस्तक्षेप करने से विचलित होना चाहिये, इस प्रकार अपनी स्थिति पर दृड़ रहने का अभ्यास करना चाहिये।

जब कोई व्यक्ति अपने आध्यात्मिक उत्थान की इच्छा करता है, तब बुद्धि के द्वारा सत्य को जानकर सत्संग करने लगता है तो उस व्यक्ति का विवेक जाग्रत होता है, तब उसके मन में उस सत्य को ही पाने की लालसा उत्पन्न होती है।

जब यह लालसा अपनी चरम सीमा पर पहुँचती है तब मन में शुद्ध-भाव की उत्पत्ति होती है, तब उस व्यक्ति को सर्वज्ञ सत्य की अनुभूति होती है, यह शुद्ध-भाव मक्खन के समान अति कोमल, अति निर्मल होता है।

बस यही मक्खन परम-सत्य स्वरूप भगवान श्रीकृष्ण को प्रिय है, इस शुद्ध-भाव रूपी मक्खन को चुराने के लिये भगवान स्वयं आते हैं।

यही "कर्म-योग" का सम्पूर्ण सार है। यही मनुष्य जीवन का सार है। यही मनुष्य जीवन का एकमात्र उद्देश्य है। यही मनुष्य जीवन की अन्तिम उपलब्धि है। यही मनुष्य जीवन की परम-सिद्धि है। इसे प्राप्त करके कुछ भी पाना शेष नहीं रहता है। यह उपलब्धि केवल मनुष्य जीवन ही प्राप्त होती है।

॥ हरि ॐ तत सत ॥

श्री हरि विष्णु के दशावतार स्वरूप के दर्शन

श्री हरि विष्णु का कल्की अवतार कलयुग के अंत में होगा

हमारे धर्म ग्रंथों में उल्लेख है कि कलयुग के अंत में भगवान विष्णु अवतरित होंगे तथा संसार को अधर्मियों से मुक्ति दिलाएंगे। महाभारत के वनपर्व में इस संदर्भ में विस्तृत उल्लेख आया है।
उसके अनुसार कलयुग के अंत में जब सत्य की हानि होने के कारण मनुष्यों की आयु थोड़ी हो जाएगी। (उस समय मनुष्य की आयु अधिक से अधिक सोलह वर्ष की होगी।) आयु की कमी के कारण मनुष्य पूर्ण विद्या का उपार्जन नहीं कर सकेंगे। सभी जातियाँ आपस में संतानोत्पादन कर वर्ण संकर हो जाएंगे, इनका विभाग करना कठिन हो जाएगा। गायों का दर्शन दुर्लभ हो जाएगा। कलियुग में वर-कन्या अपने -आप का स्वयंवर कर लेंगे। कोई भगवान का नाम नहीं लेगा। तप,यज्ञ, पूजन आदि बंद हो जाएंगे। ब्राह्मण व्रत-नियमों का पालन नहीं करेंगे। जब चहुंओर असत्य और अधर्म का साम्राज्य होगा। अधिकांश मनुष्य धर्महीन, मांसभोजी और शराब पीने वाले होंगे। उसी समय इस युग का अंत निकट होगा।
तब शम्भल नामक ग्राम में विष्णुयशा नाम के ब्राह्मण के घर में एक बालक का जन्म होगा। उसका नाम होगा कल्की विष्णुयशा। यह बालक बहुत ही बलवान, बुद्धिमान और पराक्रमी होगा। मन के द्वारा चिंतन करते ही उसके पास इच्छानुसार वाहन, अस्त्र-शस्त्र, योद्धा और कवच उपस्थित हो जाएँगे। वह ब्राह्मणों की सेना साथ लेकर संसार में सर्वत्र फैले हुए मलेच्छों का नाश कर डालेगा। वही सब दुष्टों का नाश करके सतयुग का प्रवर्तक होगा। यह ही भगवान की विष्णु का कल्की अवतार होगा।

श्री हरि विष्णु का वामन अवतार



Friday, December 31, 2010

शुभ कामनाएं

सर्वस्तरतु दुर्गाणि सर्वो भद्राणि पश्यतु।
सर्वः कामानवाप्नोतु सर्वः सर्वत्र नन्दतु॥
सब लोग कठिनाइयों को पार करें। सब लोग कल्याण को देखें। सब लोग अपनी इच्छित वस्तुओं को प्राप्त करें। सब लोग सर्वत्र आनन्दित हों
और ...
सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चिद्‌ दुःखभाग्भवेत्‌॥
सभी सुखी हों। सब नीरोग हों। सब मंगलों का दर्शन करें। कोई भी दुखी न हो।

Saturday, December 25, 2010

मंत्र शक्ति से लाभ पाएं




।। लक्ष्मी मन्त्र ।।


ॐ श्री महालक्ष्म्यै नमः।
।। स्वास्थ्य प्राप्ति मन्त्र ।।
अच्युतानन्द गोविन्द
नामोच्चारण भेषजात ।
नश्यन्ति सकला रोगाः
सत्यंसत्यं वदाम्यहम् ।।
।। सफ़लता प्राप्ति मन्त्र ।।
कृष्ण कृष्ण महायोगिन्
भक्तानाम भयंकर
गोविन्द परमानन्द सर्व मे वश्यमानय ।।
।। सम्पत्ति प्राप्ति मन्त्र ।।
आयुर्देहि धनं देहि विद्यां देहि महेश्वरि ।
समस्तमखिलां देहि देहि मे परमेश्वरि ।।
।। दुख विनाशक मन्त्र ।।
1. ॐ अनन्ताय नमः ।
2. ॐ गोविन्दाय नमः ।
।। निर्विघ्न निद्रा मन्त्र ।।
हे पद्मनाभं सुरेशं ।
हे पद्मनाभं सुरेशं ।
।। मुकदमें में विजय का मन्त्र ।।
हे चक्रधर !
हे चक्रपाणि !!
हे चक्रायुधधारी !!!
।। ग्रह पीड़ा-नक्षत्र दोष दूर करने का मन्त्र ।।
नारायणं सर्वकालं क्षुत प्रस्खलनादिषु ।
ग्रह नक्षत्र पीडाषु देव बाधाषु सर्वतः ।।
।। सन्तान सुख मन्त्र ।।
हे जगन्नाथ ! हे जगदीश !!
हे जगत् पति !! हे जगदाधार !!
।। भय से मुक्ति मन्त्र ।।
हृषिकेश गोविन्द हरे मुरारी !
हे ! हृषिकेश गोविन्द हरे मुरारी !!
।। आपदाओं से त्राण पाने का मन्त्र ।।
हे वासुदेव !
हे नृसिंह !
हे आपादा उद्धारक !
।। श्री राम के जप मन्त्र ।।
1. ॐ राम ॐ राम ॐ राम ।
2. ह्रीं राम ह्रीं राम ।
3. श्रीं राम श्रीं राम ।
4. क्लीं राम क्लीं राम ।
5. फ़ट् राम फ़ट् ।
6. रामाय नमः ।
7. श्री रामचन्द्राय नमः ।
8. श्री राम शरणं मम् ।
9. ॐ रामाय हुँ फ़ट् स्वाहा ।
10. श्री राम जय राम जय जय राम ।
11. राम राम राम राम रामाय राम ।
।। स्नान मन्त्र ।।
गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति ।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलऽस्मिन्सन्निधिं कुरु ।।
।। सूर्य अर्घ्य मन्त्र ।।
एहि सूर्य सहस्त्रांशो तेजोराशे जगत्पते ।
अनुकम्पय मां देवी गृहाणार्घ्यं दिवाकर ।।
।। आसन व शरीर शुद्धि मन्त्र ।।
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतो5पि वा ।
यः स्मरेत पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ।।
।। चरणामृत मन्त्र ।।
अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम् ।
विष्णोः पादोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते ।।
।। चन्द्र अर्घ्य मन्त्र ।।
क्षीरोदार्णवसम्भूत अत्रिगोत्रसमुद् भव ।
गृहाणार्ध्यं शशांकेदं रोहिण्य सहितो मम ।।
।। सूर्य दर्शन मन्त्र ।।
कनकवर्णमहातेजं रत्नमालाविभूषितम् ।
प्रातः काले रवि दर्शनं सर्व पाप विमोचनम् ।।
।। तिलक लगाने का मन्त्र ।।
केशवानन्न्त गोविन्द बाराह पुरुषोत्तम ।
पुण्यं यशस्यमायुष्यं तिलकं मे प्रसीदतु ।।
कान्ति लक्ष्मीं धृतिं सौख्यं सौभाग्यमतुलं बलम् ।
ददातु चन्दनं नित्यं सततं धारयाम्यहम् ।।
।। माला जपते समय का मन्त्र ।।
अनिध्यं कुरु माले त्वं गृह् णामि दक्षिणे करें ।
जापकाले च सिद्धयर्थें प्रसीद मम सिद्धये ।।
।। शिखा बाँधने का मन्त्र ।।
चिद्रूपिणि महामाये दिव्यतेजः समन्विते ।
तिष्ठ देवि शिखामध्ये तेजोवृद्धि कुरुव मे ।।
।। तुलसी स्तुति मन्त्र ।।
देवी त्वं निर्मिता पूर्वमर्चितासि मुनीश्वरैः ।
नमो नमस्ते तुलसी पापं हर हरिप्रिये ।।
।। तुलसी तोड़ने का मन्त्र ।।
मातस्तुलसि गोविन्द हृदयानन्द कारिणी ।
नारायणस्य पूजार्थं चिनोमि त्वां नमो5स्तुते ।।
पीपल मे जल देने का मन्त्र ।
कुलानामयुतं तेन तारितं नात्र संशयः।
यो5श्वत्थमूलमासिंचेत्तोयेन बहुना सदा ।।
।। पीपल पूजन ।।
अश्वत्थाय वरेण्याय सर्वैश्वर्यदायिने ।
अनन्तशिवरुपाय वृक्षराजाय ते नमः ।।
।। शंख पूजन मन्त्र ।।
त्वं पुरा सागरोत्पन्नो विष्णुना विधृतः करें ।
निर्मितः सर्वदेवैश्च पाञ्चजन्य नमो5स्तुते ।।
।। प्रदक्षिणा मन्त्र ।।
यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च ।
तानि तानि प्रणश्यन्ति प्रदक्षिण पदे पदे ।।
।। नवग्रह मन्त्र ।।
ॐ ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी, भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्च ।
गुरुश्च शुक्रः शनिराहु केतवः, सर्वे ग्रहा शान्तिकरा भवन्तु ।।
।। अन्नपूर्णा मन्त्र ।।
अन्नपूर्णे सदा पूर्णे शंकरप्राणवल्लभे ।
ज्ञानवैराग्यसिद्ध्य भिक्षां देहि च पार्वति ।।
।। भोग लगाने का मन्त्र ।।
त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये ।
गृहाण सम्मुखो भूत्वा प्रसीद परमेश्वर ।।
।। अग्नि जिमाने का मन्त्र ।।
ॐ भूपतये स्वाहा, ॐ भुवनप, ॐ भुवनपतये स्वाहा ।
ॐ भूतानां पतये स्वाहा ।।
कहकर तीन आहूतियाँ बने हुए भोजन को डालें । या
।। ॐ नमो नारायणाय ।।
कहकर नमक रहित अन्न को अग्नि में डालें ।
।। भोजन से पूर्व बोलने का मन्त्र ।।
ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्म समाधिना ।।
।। भोजन के बाद का मन्त्र ।।
अन्नाद् भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसंभवः ।
यज्ञाद भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्म समुद् भवः ।।
।। सायं दीप स्तुति मन्त्र ।।
सायं ज्योतिः परं ब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दनः ।
दीपो हरतु मे पापं सन्ध्यादीप नमोऽस्तु ते ।।
शुभं करोतु कल्याणं आरोग्यं सुखसम्पदाम् ।
मम बुद्धिप्रकाशं च दीपज्योतिर्नऽस्तु ते ।।
।। क्षमा प्रार्थना मन्त्र ।।
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं जनार्दन ।
यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे ।।
।। शयन का मन्त्र ।।
जले रक्षतु वाराहः स्थले रक्षतु वामनः ।
अटव्यां नारसिंहश्च सर्वतः पातु केशवः ।।
।। श्री गंगा जी की स्तुति ।।
गांगं वारि मनोहारि मुरारिचरणच्युतम् ।
त्रिपुरारिशिरश्चारि पापहारि पुनातु माम् ।।
।। वेद स्तुति ।।
नमः शम्भवे च मयोभवे च नमः शंकाराय च ।
मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च ।।
।। काली स्तुति ।।
    काली काली महाकाली कालिके परमेश्वरी ।
      सर्वानन्दकरी देवी नारायणि नमोस्तुते । ।
    

पीपल और शनि


शनिवार को पीपल पर जल व तेल चढाना, दीप जलाना, पूजा करना या परिक्रमा लगाना अति शुभ होता है। धर्मशास्त्रों में वर्णन है कि पीपल पूजा केवल शनिवार को ही करनी चाहिए। 
पुराणों में आई कथाओं के अनुसार ऎसा माना जाता है कि समुद्र मंथन के समय लक्ष्मीजी से पूर्व उनकी बडी बहन, अलक्ष्मी (ज्येष्ठा या दरिद्रा) उत्पन्न हुई, तत्पश्चात् लक्ष्मीजी। लक्ष्मीजी ने श्रीविष्णु का वरण कर लिया। इससे ज्येष्ठा नाराज हो गई। तब श्रीविष्णु ने उन अलक्ष्मी को अपने प्रिय वृक्ष और वास स्थान पीपल के वृक्ष में रहने का ओदश दिया और कहा कि यहाँ तुम आराधना करो। मैं समय-समय पर तुमसे मिलने आता रहूँगा एवं लक्ष्मीजी ने भी कहा कि मैं प्रत्येक शनिवार तुमसे मिलने पीपल वृक्ष पर आया करूँगी। 
शनिवार को श्रीविष्णु और लक्ष्मीजी पीपल वृक्ष के तने में निवास करते हैं। इसलिए शनिवार को पीपल वृक्ष की पूजा, दीपदान, जल व तेल चढाने और परिक्रमा लगाने से पुण्य की प्राप्त होती है और लक्ष्मी नारायण भगवान व शनिदेव की प्रसन्नता होती है जिससे कष्ट कम होते हैं और धन-धान्य की वृद्धि होती है। 

किस चौपाई से क्या लाभ और फल मिलेगा, जानिए


1पुत्र प्राप्ति के लियेप्रेम मगन कौसल्या निसि दिन जात न जान।
सुत सनेह बस माता बाल चरित कर गान ॥
2क्लेश निवारण के लियेहरन कठिन कलि कलुष कलेसू ।
महा मोह निसि दलन दिनेसू ॥
3महामारी से बचाव के लियेजय रघुबंस बनज बन भानू ।
गहन दनुज कुल दहन कृसानू ॥
4धन प्राप्ति के लियेजिमि सरिता सागर महुं जाहीं। जद्यपि ताहि कामना नाहीं॥
तिमि सुख संपति बिनहि बोलाएं। धरमसील पहिं जाहिं सुभाएं॥
5रोग शान्ति के लियेदैहिक दैविक भौतिक तापा।
राम राज नहीं काहुहि व्यापा॥
6मानसिक परेशानी दूर करने के लियेहनुमान अंगद रन गाजे।
हॉक सुनत रजनीचर भाजे॥
7अकाल मृत्यु निवारण के लियेनाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।
लोचन निज पद जंत्रित जाहि प्रान केहि बाट॥
8संपत्ति के लियेजे सकाम नर सुनहिं जे गावहिं।
सुख संपत्ति नाना विधि पावहिं॥
9सुख के लियेसुनहि विमुक्त बिरत अरु विषई।
लहहि भगति गति सम्पति नई॥
10विद्या के लियेगुरु गृह गए पढ़न रघुराई।
अलप काल विद्या सब आई॥
11मनोरथ के लियेभव भेषज रघुनाथ जसु सुनहिं जे नर अरु नारि॥
12मुकदमा जीतने के लियेपवन तनय बल पवन समाना।
बुधि बिवेक विग्यान निधाना॥
13विजय पाने के लियेकर सारंग साजि कटि भाथा।
अरि दल दलन चले रघुनाथा॥
14प्रेम बढाने के लियेसब नर करिहं परस्पर प्रीति।
चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥
15परीक्षा में सफल होने के लियेजेहि पर कृपा करिह जनु जानी। कबि उर अजिर नचावहिं बानी॥
मोरि सुधारिहि सो सब भांती। जासु कृपा नहीं कृपा अघाती॥
16निंदा से बचने के लियेराम कृपा अवरेब सुधारी।
बिबुध धारि भइ गुनद गोहारी॥
17भूत बाधा निवारण के लियेप्रनवऊं पवन कुमार खल बल पावक ग्यान घन।
जासु हृदय अगार बसहि राम सर चाप धर॥
18खोई हुई वस्तु पाने के लियेगई बहोर गरीब नेवाजू।
सरल सबल साहिब रघुराजू॥
19विवाह के लियेतब जनक पाई बसिष्ठ आयसु ब्याह साज संवारि कै।
मांडवी श्रुत कीरति उरमिला कुंअरि लई हंकारि कै॥
20यात्रा में सफलता के लियेप्रबिसि नगर कीजे सब काजा।
हृदय राखि कोसलपुर राजा॥
21विभिन्न कर्यों की सिद्धि के लियेमंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सो दसरथ अजिर बिहारि॥
मंगल भवन अमंगल हारी। उमा सहित जेहि जपत पुरारी॥
जड चेतन जग जीव जत, सकल राममय जानि।
बंदऊं सब के पद कमल सदा जोरि जुग पानि॥
सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहुं मुनिनाथ।
हानि लाभ जीवन मरन, जस अपजस विधि हाथ॥
मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुवीर।
अस बिचारि रघुबंस मनि, हरहु विषम भव भीर॥
सुनहि विमुक्त विरत अरु विषई। लहहि भगति गति संपति नई॥
सुर दुर्लभ सुख करि जग माही। अंतकाल रघुपति पुर जाहि ॥